भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ९७४ | भैषज्यरत्नावली । | [ वृद्धिरोग- |
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अरुचिं चामवातं च शूलं वातसमुद्भवम् ।
गुल्मं चैवोदरान् व्याधीन्नाशयत्याशु तत्क्षणात् ॥
भक्तोत्तरमिदं चूर्णमश्विभ्यां निर्मितं पुरा ॥ २९ ॥
इस चूर्णको अग्निकी वृद्धि करनेके लिये ऋषियोंने कहा है। यह श्लीपद, अन्त्र-वृद्धि, दारुण वातकी वृद्धि, अरुचि, आमवात, वातज शूल, गुल्म, उदररोग एवं अन्यान्य नानाप्रकारकी व्याधियोंको तत्क्षण नाश करता है। इस भक्तोत्तरनामक चूर्णको अश्विनीकुमारोंने बनाया है ॥ २८ ॥ २९ ॥
शशिशेखररस ।
लौहमभ्रं च सिन्दूरं मर्दयेत्कन्यकाम्बुना ।
अस्य रक्तिद्वयं दद्यादन्त्ररोगनिवृत्तये ॥ ३० ॥
लोहा, अभ्रक और रससिन्दूर इनको घीग्वारके रसमें खरल करे। फिर इसकी दो दो रत्ती मात्राका सेवन करनेसे अन्त्रवृद्धिरोग निवारण होता है ॥ ३० ॥
वातारिरस ।
रसभागो भवेदेको गन्धको द्विगुणो मतः ।
त्रिगुणा त्रिफला ग्राह्या चतुर्भागश्च चित्रकः ॥ ३१ ॥
गुग्गुलुः पञ्चभागः स्यादेरण्डतैलमर्दितः ।
क्षिप्त्वाऽत्र पूर्वकं चूर्णं तेनैव सह मर्दयेत् ॥ ३२ ॥
गुडिकां कर्षमात्रां तु भक्षयेत्प्रातरेव हि ।
नागरैरण्डमूलानां क्वाथं तदनु पाययेत् ॥ ३३ ॥
शुद्ध पारा १ भाग, गन्धक २ भाग, त्रिफला ३ भाग, चीता, ४ भाग और अण्डीके तेलमें घोटीहुई गूगल ५ भाग लेवे। पूर्वोक्त औषधियोंके चूर्णको गूगलमें मिलाकर अण्डीके तेलके द्वारा उत्तम रूपसे खरल करे। फिर एक एक तोलेकी गोलियाँ बनाकर रक्खे। उनमेंसे प्रतिदिन प्रातःकाल एक एक गोली भक्षण करे। पीछेसे सोंठ और अण्डकी जडके क्वाथको पान करे ॥ ३१-३३ ॥
अभ्यज्यैरण्डतैलेन स्वेदयेत्पृष्ठदेशकम् ।
विरेके तेन सञ्जाते स्निग्धमुष्णं च भोजयेत् ॥ ३४ ॥
वातारिसंज्ञको ह्येष रसो निर्वातसेवितः ।
अन्त्रवृद्धिं निहन्त्येव ब्रह्मचर्यपुरःसरम् ॥
अनुपानं च तिलजमार्द्रकद्रवसंयुतम् ॥ ३५ ॥