भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ९८३

भारङ्गीकी जडको चावलोंके पानीमें पीसकर लेप करनेसे यह औषधि गलगण्ड, गण्डमाला और कुरण्डरोगको नष्ट करती है ॥ ८ ॥

अपचीकी चिकित्सा ।

वनकार्पासिकामूलं तण्डुलैः सह योजितम् ।
पक्त्वा पूपलिकाः खादेदपचीनाशनाय तु ॥ १ ॥
वनकपासकी १ तोला जडको चावलोंके ३ तोले चूर्णके साथ पीसकर पूये बनाकर खावे तो अपचीरोग दूर होता है ॥ १ ॥

शोभाञ्जनं देवदारु काञ्जिकेन तु पेषितम् ।
कोष्णं प्रलेपतो हन्यादपचीमतिदुस्तराम् ॥ २ ॥
सहिंजनेकी जड और देवदारुको एकत्र काँजीमें पीसकर सुहाता सुहाता लेप करनेसे अत्यन्त कठिन अपची नाश होती है ॥ २ ॥

सर्षपारिष्टपत्राणि दग्ध्वा भल्लातकैः सह ।
छागमूत्रेण संपिष्टमपचीघ्नं प्रलेपनम् ॥ ३ ॥
सरसों, नीमके पत्ते और भिलावोंका एक अन्तर्धूम उत्तम पात्रमें दग्धकर और बकरेके मूत्रमें पीसकर लेप करे तो अपची दूर होती है ॥ ३ ॥

अश्वत्थकाष्ठं निचुलं गवां दन्तं च दाहयेत् ।
वराहमज्जसंपृक्तं भस्म हन्त्यपचीव्रणान् ॥ ४ ॥
पीपलके वृक्षकी छाल, समुद्रफल और गोदन्तोंको एकत्र भस्म करलेवे । भस्ममें सुअरकी चर्बी मिलाकर प्रलेप करनेसे अपचीके व्रण शीघ्र भरजाते हैं ॥ ४ ॥

पार्ष्णिं प्रति द्वादश चाङ्गुलानि मित्वेन्द्रवस्तिं परिवर्ज्य सम्यक् ।
विदार्य मत्स्याण्डनिभानि वैद्यो निकृष्य जालान्यनलं विदध्यात् ॥ ५ ॥
एँडीसे लेकर १२ अंगुल परिमाण स्थानमें २ अँगुल परिमित इन्द्रवस्तिनामका मर्मस्थल है । उसको छोडकर शेष १० अंगुलवाले स्थानमें क्रियाकुशल वैद्य तीक्ष्ण शस्त्रसे छेदन करे । फिर मछलीके अंडेकी समान आकृतिवाले चर्बीके जालको निकालकर व्रणस्थानको अग्निसे दग्ध करदेवे । इस प्रकार करनेसे अपचीरोग समूल नष्ट होजाता है ॥ ५ ॥

मणिबन्धोपरिष्टाद्वा कुर्याद्रेखात्रयं भिषक् ।
अङ्गुलान्तरितं सम्यगपचीनां प्रशान्तये ॥ ६ ॥