भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ९८५

कफजन्य ग्रन्थिपर महुआ, जामुन, अर्जुन और बेंत इनकी समान भाग मिश्रित छालको अच्छे प्रकार एकत्र जलमें पीसकर लेप करनेसे कफज ग्रन्थि दूर होती है । कफग्रन्थिमें वमनादि क्रिया और रक्तमोक्षण क्रिया करके आनुपूर्विकासे स्नेह तथा स्वेद प्रदान करे और स्वेदित होनेपर अंगूठे, बाँस एवं पत्थरसे दबाकर विम्लापन क्रिया करे ॥ ४ ॥

विकङ्कताराग्वधकाकणन्तीकाकादनीतापसवृक्षमूलैः ।
आलेपयेदेनमलावुभार्ङ्गीकरञ्जकालामदनैश्च विद्वान् ॥ ५ ॥

कण्टाई, अमलतास, घुँघुची, काकादनीवृक्ष और हिंगोटवृक्ष इनकी जड अथवा कडवी तोंबी, भारङ्गी, करंजुआ और काला मैनफल इन सबोंकी लेप करनेसे ग्रन्थि-रोग नष्ट होता है ॥ ५ ॥

दन्तीचित्रकमूलत्वक्सौधार्कपयसा गुडः ।
भल्लातकास्थि काशीशं लेपाच्छिन्द्याच्छिलामपि ॥ ६ ॥

दन्तीमूल, चीतेकी जडकी छाल, थूहरका दूध, आकका दूध, गुड, भिलावोंकी गिरी और हीराकसीस इन सबोंको एकत्र पीसकर किया हुआ प्रलेप पत्थरको भी फोड देता है ॥ ६ ॥

ग्रन्थ्यर्बुदादिजिह्लेपो मातृवाहककीटजः ।
सर्जिका मूलकक्षारः शङ्खचूर्णसमन्वितः ॥
प्रलेपो विहितस्तीक्ष्णो हन्ति ग्रन्थ्यर्बुदादिकान् ॥ ७ ॥

पिङ्गेनामक कीटको पीसकर लेप करनेसे ग्रन्थि और अर्बुदरोग दूर होता है एवं सज्जी, मूलीका खार और शङ्खभस्म इनको एकत्र मिलाकर कियाहुआ लेप तीक्ष्ण ग्रन्थि और अर्बुदादि रोगोंको शीघ्र नष्ट करता है ॥ ७ ॥

ग्रन्थीनमर्म्मप्रभवानपक्कानुद्धृत्य चाग्निं विदधीत वैद्यः ।
क्षारेणचैतान्प्रतिसारयेत्तु संलिख्य संलिख्य यथोपदेशम् ॥ ८ ॥

जो मर्मस्थानोंमें उत्पन्न नहीं हुई हैं और पकी नहीं हैं ऐसी ग्रन्थियोंको छेदकर उस व्रणमें अग्निसे दग्ध करे और फिर क्षारादि पदार्थोंका प्रलेप करे, दग्धक्रिया वातज और वात-कफजन्य ग्रन्थिरोगमें ही करनी चाहिये । पित्तजनित ग्रन्थिमें शस्त्र-द्वारा चीरकर क्षारादिका लेप करना उचित है ॥ ८ ॥

अर्बुदकी चिकित्सा ।

ग्रन्थ्यर्बुदानां न यतो विशेषः प्रदेशहेत्वाकृतिदोषदूष्यैः ।
ततश्चिकित्सेद्भिषगर्बुदानि विधानविद्ग्रन्थिचिकित्सितेन ॥ १ ॥