भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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पृष्ठ 1020
९८८भैषज्यरत्नावली ।[ शोथ-

हल्दी, लोध, पत्तङ्ग, घरका धुआँ और मैनसिल इन सबोंको समान भाग लेवे । फिर एकत्र मधुमें उत्तम प्रकार खरल करके गाढा गाढा लेप करे तो मेदजनित अर्बुदरोग शान्त होता है ॥ १३ ॥

एतामेव क्रियां कुर्यादशेषां शर्करार्बुदे ॥ १४ ॥
शर्कराजन्य अर्बुदरोगमें पूर्वोक्त संपूर्ण क्रियाओंको ही करना चाहिये ॥ १४ ॥

रौद्ररस ।
शुद्धसूतं समं गन्धं मर्द्यं यामचतुष्टयम् ।
नागवल्लीदलयुतं मेघनादः पुनर्नवा ॥ १५ ॥
गोमूत्रपिप्पलीयुक्तं मर्द्यं रुद्ध्वा पुटेल्लघु ।
लिहेत्क्षौद्रे रसो रौद्रो गुञ्जामात्रोऽर्बुदं जयेत् ॥ १६ ॥
शुद्ध पारा और शुद्ध गन्धक दोनोंको समान भाग लेकर एकत्र चार प्रहरतक खरल करे । फिर इनको पानोंके रस, चौलाईके रस, पुनर्नवेके रस, गोमूत्र और पीपलके क्वाथमें अलग अलग सात सात बार उत्तम रूपसे खरल करके लघुपुटमें रखकर मंदमंद अग्निसे पकावे । जब शीतल होजाय तब निकालकर पीसलेवे । इसको प्रतिदिन एक रत्तीप्रमाण शहदमें मिलाकर सेवन करनेसे अर्बुदरोग नष्ट होता है । इसको रौद्ररस कहते हैं ॥ १५ ॥ १६ ॥

काञ्चनारगुटिका ।
त्रिफलायास्त्रयो भागा व्योषाच्च द्विगुणो मतः ।
तस्माच्च द्विगुणं ज्ञेयं काञ्चनारस्य वल्कलम् ॥ १७ ॥
एकीकृते तु चूर्णेऽस्मिन् समो दद्योऽथ गुग्गुलुः ।
क्षौद्रं दशगुणं दद्यात् त्रिफलाचूर्णतो भिषक् ॥ १८ ॥
त्रिफला ३ तोले, त्रिकुटेकी प्रत्येक औषधि दो दो तोले और कचनारकी छाल १२ तोले लेकर एकत्र चूर्ण करलेवे । फिर समस्त चूर्णके बराबर शुद्ध गूगल मिलाकर ३० तोले शहदमें उत्तम प्रकारसे खरल करे ॥ १७ ॥ १८ ॥

सर्वासु गण्डमालासु गलगण्डे तथैव च ।
नाडीव्रणेषु गण्डेषु गुडिकेयं प्रशस्यते ॥ १९ ॥
इसको सर्वप्रकारकी गंडमाला, गलगंडरोग और नाडीव्रणादि रोगोंमें विधिपूर्वक सेवन करनेसे शीघ्र उपकार होता है ॥ १९ ॥