भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ९९० | भैषज्यरत्नावली । | [ गलगण्डादि- |
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तुम्बीतैल ।
विडङ्गक्षारसिन्धूत्थरास्नाग्निव्योषदारुभिः ।
कटुतुम्बीफलरसैः कटुतैलं विपाचयेत् ।
चिरोत्थमपि नस्येन गलगण्डं विनाशयेत् ॥ २८ ॥
वायविडङ्ग, जवाखार, सेंधानमक, रास्ना, चीता, त्रिकुटा और देवदारु इनके कल्क और कडवी तोम्बीके फलोंके रसद्वारा सरसोंके तेलको विधिपूर्वक पकावे । इस तेलकी नास देनेसे बहुत पुराना गलगंडरोग नाश होता है ॥ २८ ॥
अमृतादितैल ।
तैलंपिवेच्चामृतवल्लिनिम्बहंसाह्वलावृक्षकपिप्पलीभिः ।
सिद्धं बलाभ्यां च सदेवदारु हिताय नित्यं गलगण्डरोगी॥२९॥
गिलोय, नीमकी छाल, हंसपदी, कुडेकी छाल, पीपल, खिरेंटी, कंघी और देवदारु इनके समान भाग मिश्रित कल्कको आधसेर, पाकके लिये जल ८ सेर और तिलका तेल दो सेर लेकर एकत्र पकावे। जब पकते पकते तेलमात्र शेष रहजाय तब उतारले। इस तेलको मर्दन करनेसे गलगंडरोगी आरोग्य होय ॥ २९ ॥
छुछुंदरीतैल ।
अभ्यङ्गान्नाशयेत्क्षिप्रं गण्डमालां सुदारुणाम् ।
छुछुन्दर्या विपक्वं च क्षणात्तैलवरं ध्रुवम् ॥ ३० ॥
छुछुंदरके मांसमें तिलके तेलको पकाकर मालिश करनेसे अत्यन्त दारुण गंडमालारोग तत्क्षण नाश होता है ॥ ३० ॥
शाखोटकतैल ।
गण्डमालापहं तैलं सिद्धं शाखोटकत्वचः ।
सहोरावृक्षकी छालके क्वाथ और कल्कद्वारा तिलके तेलको सिद्धकर मलनेसे गलगंड, गंडमालादि रोग नष्ट होते हैं।
बिम्बादितैल ।
बिम्बाश्ममारनिर्गुण्डीसाधितं वापि नावनम् ॥ ३१ ॥
कंदूरीकी जड, कनेरकी छाल और निर्गुंडीकी जड इनके रसमें सिद्ध किये तेलकी नास लेनेसे गंडमालादि विकार दूर होते हैं ॥ ३१ ॥
निर्गुंडीतैल ।
निर्गुण्डीस्वरसे वाऽथ लाङ्गलीमूलकल्कितम् ।
तैलं नस्यान्निहन्त्याशु गण्डमालां सुदारुणाम् ॥ ३२ ॥