भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ९९७


बहेड़ा, आमला, लोहभस्म, वायविडङ्ग, पाँचों नमक, चव्य, पीपलामूल, हाऊबेर, वच, कचूर, पाठ, देवदारु, छोटी इलायची, विधारा, निसोत, चीता और दन्तीकी जड इन सब औषधियोंको समानभाग लेकर एकत्र कूटपीस कर चूर्ण करलेवे । फिर इस चूर्णको हरडोंके क्वाथ और गुडमें अच्छे प्रकार खरल करके दस दस रत्तीकी सुन्दर गोलियाँ बनालेवे । इनमेंसे प्रतिदिन प्रातःकाल एक एक गोली सेवन करे और ऊपरसे शीतल जल पीवे ॥ २५-२८ ॥

श्लीपदं कफवातोत्थं रक्तमांसाश्रितं च यत् ।
मे दोगतं धातुगतं निहन्ति नात्र संशयः ॥ २९ ॥
अर्बुदं गण्डमालां च वातरक्तं सुदारुणम् ।
कफवातोद्भवं रोगमन्त्रवृद्धिं चिरन्तनीम् ।
वातरक्ते वातकफे गुदरोगे कृमौ तथा ॥ ३० ॥
अग्निवृद्धिं करोत्येष बलवर्णं च सुस्थताम् ।
श्रीमद्गहननाथेन निर्मितो विश्वसम्पदे ॥ ३१ ॥
नित्यानन्दरसश्चायं महाश्लीपदनाशनः ।
रक्तजे पित्तजे चापि श्लीपदे योजयेदमुम् ॥
नातः परतरं किञ्चिद्विद्यते श्लीपदानये ॥ ३२ ॥

यह औषधि कफवातजन्य अथवा दूषितरक्त और मांससे उत्पन्न हुए श्लीपद, मेदोगत तथा धातुगत श्लीपद, अर्बुद, गण्डमाला, दारुण वातरक्त, कफ और वातसें होनेवाले रोग, अन्त्रवृद्धि, वातकफका वातरक्त, बवासीर और कृमिरोगको निश्चय नाश करती है एवं अग्निकी वृद्धि, बल, वर्ण और आरोग्यताको उत्पन्न करती है । सांसारिक जीवोंके कल्याणके लिये श्रीमान् गहनानन्दनाथने इसको निर्माण किया है । यह नित्यानन्दरस अत्यन्त कठिन और पुराने श्लीपदको तत्काल नष्ट करता है । इसको रक्तज और पित्तज श्लीपदरोगमें भी प्रयोग करना चाहिये । श्लीपद-रोगको नष्ट करनेके लिये इससे बढ़कर शक्तिशाली दूसरी औषधि नहीं है ॥ २९-३२ ॥


कृष्णाद्यमोदक ।

कृष्णाचित्रकदन्तीनां कर्षमर्द्धपलं पलम् ।
विंशतिश्च हरीतक्या गुडस्य तु पलद्वयम् ॥
मधुना मोदकं खादेच्छ्लीपदं हन्ति दुस्तरम् ॥ ३३ ॥