भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । ७१
शूलमष्टविधं हन्ति प्रमेहानपि विंशतिम् ।
प्लीहानमग्रमांसं च यकृतं च हलीमकम् ॥ ७७ ॥
पृथग्दोषांश्च विविधान् समस्तान् विषमज्वरान् ।
तान् सर्वान् नाशयेत्याशु वृक्षमिन्द्राशनिर्यथा ॥ ७८ ॥
यह क्वाथ-वातज, पित्तज, कफज, त्रिदोषज, द्विदोषज, सतत, अत्यन्त विषम, आभ्यन्तर, बाह्य और धातुगतज्वर, विशेषकर दैर्घरात्रिक (बहुतदिनोंतक रहनेवाला) ज्वर इन सब प्रकारके ज्वरोंको शीघ्र नष्ट करता है । तथा संग्रहणी, अतिसार, खाँसी, श्वास, कामला, शोष, शोथ, मन्दाग्नि, अरुचि, आठ प्रकारका शूल, बीसप्रकारका प्रमेह, प्लीहा, अग्रमांस, यकृद्रोग, हलीमक, वातादि भिन्नभिन्न दोषोंसे होनेवाले विविध प्रकारके ज्वर और सब प्रकारके विषमज्वरोंको इस प्रकार शीघ्र नष्ट करता है जैसे वज्र वृक्षोंको तत्काल नष्ट करदेता है ॥ ७४-७८ ॥
ऐकाहिकज्वरमें पटोलादिक्वाथ ।
पटोलारिष्टमृद्वीकाः श्यामाकं त्रिफला वृषम् ।
क्वाथ ऐकाहिकं हन्ति शर्करामधुयोजितः ॥ ७९ ॥
परवल, नीमकी छाल, दाख, अनन्तमूल, त्रिफला और अडूसा इनका क्वाथ खांड और शहद मिलाकर पान करनेसे ऐकाहिकज्वर दूर होता है ॥ ७९ ॥
गुडूच्यादि ।
गुडूचीमुस्तधात्रीणां कषायं वा समाक्षिकम् ।
प्रातःकालनिषेवेण विषमज्वरनाशनम् ॥ ३८० ॥
गिलोय, नागरमोथा और आमले इनका एकत्र क्वाथ बनाकर उसमें शहद डालकर प्रतिदिन प्रातःकाल सेवन करनेसे विषमज्वर दूर होता है ॥ ३८० ॥
सन्ततज्वरमें कलिंगादिक्वाथ ।
कलिंगकं पटोलस्य पत्रं कटुकरोहिणी ।
पिबेत् सन्ततके नित्यं किञ्चित्क्षौद्रेण संयुतम् ॥ ८१ ॥
सन्ततज्वरमें-इन्द्रजौ, पटोलपात और कुटकी इनके क्वाथको थोड़ासा शहद मिलाकर पान करनेसे विशेष लाभ होता है ॥ ८१ ॥