भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा] भाषाटीकासहिता । १०३३
करवीराद्यतैल ।
करवीरनिशादन्तीलाङ्गलीलावणाग्निभिः ।
मातुलुङ्गार्कवत्साह्वे पचेत्तैलं भगन्दरे ॥ २९ ॥
कनेरकी जड, हल्दी, दन्तीकी जड, कलिहारी, सैंधानमक, चीता, बिजौरे नींबूकी जड, आक की जड और कुडेकी छाल इनके समान भाग मिश्रित कल्कके साथ तेलको पकाकर लगानेसे भगन्दररोगमें अत्यन्त लाभ होता है ॥ २९ ॥
निशाद्यतैल ।
निशार्कक्षीरसिन्ध्वग्निपुराश्वहनवत्सकैः ।
सिद्धमभ्यञ्जने तैलं भगन्दरविनाशनम् ॥ ३० ॥
हल्दी, आकका दूध, सैंधानोन, चीता, गुगल, कनेरकी जड और कुडेकी छाल इन सबोंका कल्क समान रूपसे मिलाहुआ एक सेर, जल आठ सेर और तिलका तेल दो सेर लेकर सबको एकत्रकर विधिपूर्वक पकावे । इस तेलको लगानेसे भगन्दररोग शीघ्र नष्ट होता है ॥ २९ ॥
सैन्धवाद्यतैल ।
सैन्धवं चित्रकं दन्ती पलाशं चेन्द्रवारुणी ।
गोमूत्रेऽष्टगुणे पक्त्वा ग्राह्यमष्टावशेषितम् ॥ ३१ ॥
क्वाथपादं पचेत्तैलं कल्कः कृष्णायसं मृतम् ।
पचेत्तैलावशेषं च तेन लेप्यं भगन्दरम् ॥
असाध्यं साधयत्याशु पक्वं कृमिकुलान्वितम् ॥ ३२ ॥
सैंधानमक, चीता, दन्तीकी जड, ढाक और इन्द्रायणकी जड इनको समान भाग लेकर अठगुने गोमूत्रमें पकावे । जब पकते पकते आठवाँ भाग शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर इसमें क्वाथसे चौथाई भाग तिलका तेल और कल्ककें लिये कृष्णलोहकी भस्म ८ तोले मिलाकर तेलको पकावे । जब तेलमात्र शेष रहजाय तब उतारलेवे । इस तेलको लगानेसे कृमियुक्त और असाध्य भगन्दर-रोग तत्काल नाश होता है । ३१ ॥ ३२ ॥
भगन्दररोगमें पथ्य ।
आमे संशोधनं लेपो लंघनं रक्तमोक्षणम् ।
पक्वे पुनः शस्त्रवहिक्षारकर्म यथाविधि ॥ ३३ ॥