भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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पृष्ठ 1068

१०३६ भैषज्यरत्नावली । [ उपदंश-

उक्तरोग शीघ्र शान्त होता है ॥ ६ ॥ ७ ॥ जयाजात्यश्वमारार्कशम्याकानां दलैः पृथक् । कृतं प्रक्षालने क्वाथं मेढ्रपाके प्रयोजयेत् ॥ ८ ॥ उपदंशमें लिङ्गके पकजानेपर जयन्ती, चमेली, कनेर, आक और अमलतास इनके पत्तोंका अलग अलग क्वाथ बनाकर व्रणोंको धोवे ॥ ८ ॥

धूप । बदरार्कमपामार्गस्तथा ब्राह्मणयष्टिका । हिङ्गुलं च समं चैषां भागं कृत्वा तु धूपनम् ॥ दोषजं कर्मजं हन्यादुपदंशादिकं व्रणम् ॥ ९ ॥ बडीबेरकी छाल, आक, चिरचिटा, भारङ्गी और सिंगरफ इन सबोंको समान भाग लेकर एकत्र पीसकर धूनी देवे । इससे दोषज और कर्मज दोनों प्रकारकें उपदंशोंके व्रण नष्ट होते हैं ॥ ९ ॥

धूप । रसं वङ्गं च खदिरं हरीतक्याश्च भस्मकम् । कोमलं कदलीभस्म गुवाकफलभस्म च ॥ १० ॥ एतत्तोलकमानं स्याद्धिङ्गुलं हरितालकम् । गन्धकं तुत्थकं वापि पद्मकं सरलं तथा ॥ ११ ॥ द्वे चन्दने देवदारु वकमं काष्ठमेव च । तथा केशरकाष्ठं च माषमानं प्रकल्पयेत् ॥ १२ ॥ एकीकृत्य च सञ्चूर्ण्य सर्वं चाङ्गेरिकाद्रवैः । तुलसीपत्रजरसैः पुरातनगुडेन च ॥ १३ ॥ घृतेन सह षट् कार्या वटिका मन्तरक्षिताः ॥ १४ ॥ शुद्ध पारा, वङ्ग, सफेद खैर, हरड़की, भस्म, कोमल केलेकी भस्म और सुपारीकी भस्म ये प्रत्येक एक एक तोला, सिंगरफ, हरिताल, शुद्ध गन्धक, तूतिया, पद्माख, धूपसरल, लालचन्दन, सफेद चन्दन, देवदारु, अगस्तिया और नागकेशर ये प्रत्येक एक एक माशा लेवे । फिर सबोंको एकत्र पीसकर लोहेके पात्रमें नोनियाघासके रस और तुलसीके रसको डालकर लोहेके डंडेसे खरल कर पुराने गुड और घृतमें मर्दन करके छः गोलियाँ बनालेवे ॥ १०-१४ ॥