भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१०४० भैषज्यरत्नावली । [ उपदंश-
सेवन करनेके अनन्तर कफनाशक और वात पित्तकी मिलीहुई क्रिया करे । नमक, खटाई, दिनमें सोना, रात्रिमें जागना और स्त्री प्रसंग करना तत्क्षण परित्याग कर- देवे । उक्त प्रकारसे १४ दिनतक औषधि सेवनके पश्चात् गरमजलसे स्नानकरना और जङ्गलीजीवोंके मांसरसके साथ पथ्य अन्नोंका भोजन करना हितकारी है । जबतक रोगीकी पहले जैसी अवस्थान होजाय तबतक व्यायामादि परिश्रमजन्य कार्य नहीं करने चाहिये ॥ ३५ ॥
एवं कृतविधानं तु यः करोत्येतदौषधम् ।
स एव पापरोगस्य पारं याति जितेन्द्रियः ॥ ३६ ॥
पिडका विलयं यान्ति बलं तेजश्च वर्द्धते ।
रुजा च प्रशमं याति ग्रन्थि शोथश्च शाम्यति ॥ ३७ ॥
अस्थांभवति दाढर्चं च आमवातश्च शाम्यति ।
भैरवेन समाख्यातो रसोऽयं भैरवः स्वयम् ॥ ३८ ॥
जो जितेन्द्रिय रोगी इस निर्दिष्ट रीतिके अनुसार रहता हुआ औषधि सेवन करता है वहही इस पापरोगको जीतकर सुखी होता है । इस औषधिसे उपदंशकी पिडिकायें नाश होती हैं और बल तथा तेज बढता है । एवं अन्यान्य सब रोग शान्त होजाते हैं, ग्रन्थि और सूजन नष्ट होती हैं, हड्डियें अत्यन्त दृढ होती हैं और आमवातरोग शान्त होता है । इसको भैरवजीने कहा है इससे यह रस भैरवनामसे प्रसिद्ध है ॥ ३६-३८ ॥
रसगुग्गुलु ।
ग्राह्यः पातनयन्त्रेण शुद्धश्चन्द्रसमो रसः ।
रक्तिकाशतमेतस्य शर्करा त्रिगुणा भवेत् ॥ ३९ ॥
ततश्चतुर्गुणो ग्राह्यो गुग्गुलुर्महिषाक्षकः ।
घृतं रससमं दद्यान्मर्दयेच्च प्रयत्नतः ॥ ४० ॥
विंशतिर्वटिकाः कार्यास्तिस्रस्तिस्रो दिनत्रयम् ।
एकादश दिनैरन्या देया एकादशैव ताम् ॥
सप्ताहद्वयमेवं च कारयेद्भिषजां वरः ॥ ४१ ॥
पातनयन्त्रमें शुद्ध किया हुआ पारा १०० रत्ती, चीनी ३०० रत्ती, शुद्ध भैंसिया गूगल ४०० रत्ती और घृत १०० रत्ती लेवे । फिर सर्वोको एकत्र लोहेके पात्रमें