भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

पृष्ठ 1106, कुल 1416 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1106

१०७४ भैषज्यरत्नावली । [ कुष्ठरोग-

खैर ३२ तोले और बापची ८ तोले, त्रिफला, नीमकी छाल, देवदारु, दारु- हल्दी और पित्तपापडा ये प्रत्येक चार चार तोले तथा कटेरी ८ तोले इन सबोंको एकत्र कर १६ सेर जलमें पकावे। जब पकते पकते चतुर्थांश जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर इस क्वाथमें घी १ प्रस्थ एवं बापची १६ तोले, खैर ४ तोले तथा पटोलकी जड, हरड, बहेडा, आमला, त्रायमाणा, धमासा और कुटकी प्रत्येकके एकएक कर्ष बारीक पिसेहुए कल्क और आठ तोले शुद्ध गूगल सबोंको एकत्र खूब बारीक पीसकर मिलादेवे । फिर यथाविधि मन्दमन्द अग्निमें घृतको सिद्ध करे । यह घृत श्वेतकुष्ठको इस प्रकार नष्ट करता है जिस प्रकार जल अग्निको तत्काल शान्त करदेता है ॥ ५२-५६ ॥

अष्टादशानां कुष्ठानां भेषजं परमं मतम् । आमवातापतन्त्राणां पाण्डुप्रदररोगिणाम् ॥ ५७ ॥ मेहपीनसकण्डूघ्नं पीतं दीपनपाचनम् । सोमराजीघृतं नाम निर्मितं ब्रह्मणा पुरा ॥ ५८ ॥

यह घृत अठारहों प्रकारके कुष्ठोंकी परमोत्कृष्ट औषधि है। यह आमवात, अपतन्त्र, पाण्डु, प्रदर, प्रमेह, पीनस, खुजली इत्यादि रोगोंको पान करतेही दूर करता है और अग्निको अत्यन्त दीपन करताहै एवं पाचनशक्तिको बढाता है । इस सोमराजीनामक घृतको पूर्वकालमें ब्रह्माजीने निर्माण किया है ॥ ५७ ॥ ५८ ॥

पञ्चतिक्तघृत ।

निम्बं पटोलं व्याघ्रीं च गुडूचीं वासकं तथा । कुर्याद्दशपलान्भागानैकैकस्य सुकुट्टितान् ॥ ५९ ॥ जलद्रोणे विपक्तव्यं यावत्पादावशेषितम् । घृतप्रस्थं पचेत्तेन त्रिफलागर्भसंयुतम् ॥ ६० ॥ पञ्चतिक्तमिदं ख्यातं सर्पिः कुष्ठविनाशनम् । अशीतिं वातजान्रोगांश्चत्वारिंशच्च पैत्तिकान् ॥ ६१ ॥ विंशतिं श्लैष्मिकांश्चैव पानादेवापकर्षति । दुष्टव्रणकृमीनर्शः पञ्च कासांश्च नाशयेत् ॥ ६२ ॥

नीमकी छाल, पटोलपात, कटेरी, गिलोय और अडूसा ये प्रत्येक दस दस पल लेवे । सबोंको एकत्र कूटकर ३२ सेर जलमें पकावे । जब चौथाई भाग जल अवशिष्ट रहे तब उतारकर छान लेवे । फिर इस क्वाथमें ताजा घी १ प्रस्थ