भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १०८५


कुचेला कुलको रात्रिर्मेघनामा च ग्रन्थिका ।
शम्याकमर्कक्षीरं च कासुन्देश्वरमूलकम् ॥ २२ ॥
आचजिङ्गी महातिक्ता विशालाच्छविपत्रकम् ।
पूतिकास्फोटमूर्वा च सप्तपर्णशिरीषकम् ॥ २३ ॥
कुटजं पिचुमर्दश्च महानिम्बं तथैव च ।
गुडूची चन्द्ररेखा च सोमराट् चक्रमर्दकम् ॥ २४ ॥
तुम्बुरुर्भृङ्गयष्ट्याह्वकन्दं कटुकरोहिणी ।
शठी दार्बी त्रिवृत्पद्मग्रन्थिकागुरुपुष्करम् ॥ २५ ॥
कर्पूरं कटफलं मांसी सुरैलाटरुषाभयम् ।
एतेषां कार्षिकैः कल्कैर्नाम्ना कन्दर्प उच्यते ॥ २६ ॥

सतौनेकी छाल, पीला चन्दन, गिलोय, नीमकी छाल, सिरसकी छाल, बकायन, जयन्ती, कडवीतोंबी, सेंधिनी और हल्दी इनको चालीस चालीस तोले लेकर बत्तीस सेर जलमें पकावे । जब पकते पकते चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छान लेवे । फिर इस क्वाथमें सरसोंका तेल एक प्रस्थ, गोमूत्र चार प्रस्थ, अमलतास, भाङ्गरा, जयन्ती, धतूरा, हल्दी, भाँग, चीता, खजूर, गोबरका रस, आक और थूहर इन सबोंके पत्तोंका रस एक एक प्रस्थ तथा कल्कके लिये महाकाल ( लताविशेष ), वच, ब्राह्मी, कडवीतोंबी, चीतेकी जड, घीग्वार, कुचला, परवल, हल्दी, नागरमोथा, पीपलामूल, अमलतासका गूदा, आकका दूध, कसौंदी, कलिहारीकी जड, रञ्जनद्रुम ( पुष्पवृक्ष विशेष ), मञ्जीठ, पाठ, इन्द्रायनकी जड, बिछुओके पत्ते, करञ्जकी जड, आस्फोटनामकी लता, मूर्वाकी जड, सतवनकी छाल, सिरसकी छाल, कुडेकी छाल, नीमकी छाल, बकायनकी छाल, गिलोय, बापचीके बीज, चकवडके बीज, धनियाँ, भाँगरा, मुलहठी, जिमीकन्द, कुटकी, कचूर, दारुहल्दी, निसोत, पद्माख, गठिवन, अगर, पोहकरमूल, कपूर, कायफल, बालछड, कपूरकचरी, इलायची, अडूसेकी छाल और खस इन औषधियोंको दो दो तोले, परन्तु सोमराजीके बीज चार तोले लेवे और सबोंको एकत्र कूटपीसकर, यथाविधिसे मिलाकर तेलको पकावे । इस प्रकार सिद्ध किये हुए तेलको कन्दर्पतेल कहते हैं ॥

अष्टादशविधं कुष्ठं ग्रन्थिमज्जगतं तथा ।
हस्तपादाङ्गुलीसन्धिगलितं सर्वसंधिषु ॥ २७ ॥