भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१०९२ भैषज्यरत्नावली । [ अम्लपित्त-
कटुतैलं तप्तनीरं पित्तश्लेष्महराणि च ।
कटुतिक्तकषायाणि सर्वाणीति गणः सखा ॥
शीतपित्तोद्दर्दकोठरोगिणां स्याद्यथाबलम् ॥ २० ॥
वमन, विरेचन, प्रलेप और रक्तमोक्षण कराना, पुराने शालिचावल, जङ्गली पशु-पक्षियोंका मांसरस, मूँगका यूष, कुलथीका यूष, ककोडे, करेले, सहिंजनेकी फली, मूली, पोईका शाक, शालिश्चशाक, बेंतकी कोंपल, अनार, त्रिफला, मधु, सरसोंका तेल, गरमजल, कफ-पित्तनाशक द्रव्य और समस्त कडवे तीखे तथा कषायरसवाले पदार्थ ये सब शीतपित्त, उददर्द और कोठरोगवाले व्यक्तियोंको दोषानुसार सेवन करनेसे सुखावह कहेगये हैं ॥ १८-२० ॥
शीतपित्त, उददर्द और कोठरोगोंमें अपथ्य ।
क्षीरेक्षुजाता विविधा विकारा मत्स्योदकानूपभवामिषाणि ।
नवीनमद्यं वमिवेगरोधः प्राग्दक्षिणाशापवनोऽह्नि निद्रा ॥ २१ ॥
स्नानं विरुद्धाशनमातपश्च स्निग्धं तथाऽम्लं मधुरं कषायम् ।
गुर्वन्नपानानि च शीतपित्तकोठामयोद्दर्दवतां विषाणि ॥ २२ ॥
दूधके बने द्रव्य (दही, मट्ठादि), ईखके रससे बने (गुडादि) नानाप्रकारके द्रव्य, मछली, जलचर और अनूपदेशवासी जीवोंका मांस, नईमदिरा, वमन (कै) के वेगको रोकना, पूर्वदिशा और दक्षिणदिशाकी वायुका सेवन, दिनमें शयन, स्नान, विरुद्धभोजन, धूपका सेवन, चिकने, खट्टे, मीठे और कषैले पदार्थ, गुरुपाकी अन्न-पान ये सब वस्तुएँ शीतपित्त, कोठ और उददर्द, रोगाक्रान्त मनुष्योंको विषके समान अहितकर हैं ॥ २१ ॥ २२ ॥
इति भैषज्यरत्नावल्यां शीतपित्तोद्दर्दकोठरोगचिकित्सा ॥
अम्लपित्तकी चिकित्सा ।
वान्तिं कृत्वाऽम्लपित्ते तु विरेकं मृदु कारयेत् ।
सम्यग्वान्तविरक्तस्य सुस्निग्धस्यानुवासनम् ॥ १ ॥
अम्लपित्तरोगमें वमन और मृदु विरेचन करावे। जब उक्तक्रियाओंके द्वारा शरीरकी अच्छे प्रकार शुद्धि होजाय तब रोगीको स्निग्धद्रव्य पान कराकर अनुवासनवस्ति लगावे ॥ १ ॥