भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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पृष्ठ 1128

१०९६ | भैषज्यरत्नावली । | [ अम्लपित्त-

शीतेन वारिणा पीतं शूलं पित्तकफोच्छ्रितम् ।
निहन्ति चूर्णं सक्षौद्रमम्लपित्तं सुदारुणम् ॥ १९ ॥

नीमकी छाल, पत्ते, फल, फूल और मूल ये सब एक २ तोला, विधारा दो तोले और जौंके सक्तू १० तोले, इनमें कुछ खाँड मिलाकर इनको मधुर बनालेवे । फिर इस चूर्णको मधुर मिश्रितकर शीतल जलके साथ दो तोले प्रमाण सेवन करे । यह चूर्ण पित्त-कफोद्भवशूल और दारुण अम्लपित्तको नष्ट करता है ॥

अविपत्तिकरचूर्ण ।

त्रिकटु त्रिफला मुस्तं विडं चैव विडङ्गकम् ।
एलापत्रं च चूर्णानि समभागानि कारयेत् ॥ २० ॥
सर्वमेकीकृतं यावल्लवङ्गं तत्समं भवेत् ।
सर्वचूर्णं द्विगुणितं त्रिवृच्चूर्णं प्रदापयेत् ॥ २१ ॥
सर्वमेकीकृतं यावत्तावच्छर्करयाऽन्वितम् ।
भोजनादौ तथा मध्ये खादेन्माषाष्टकं शुभम् ॥ २२ ॥

सोंठ, पीपल, मिरच, हरड, आमला, बहेडा, नागरमोथा, विरियासञ्चर नोन, वाय-विडङ्ग, इलायची और तेजपात इनको समान भाग लेकर एकत्र चूर्ण कर लेवे । फिर इस चूर्णके बराबर भाग लौंगका चूर्ण एवं सबसे दुगुना निसोतका चूर्ण और जितना इन सब औषधियोंका चूर्ण हो उतनी खाँड मिलाकर सर्वोंको एकमएक करलेवे । इस चूर्णको आठ आठ माशेकी मात्रासे प्रतिदिन भोजनके आदि और मध्यमें सेवन करे, ऊपरसे शीतल जल अथवा नारियलका जल पान करे ॥ २०-२२ ॥

अम्लपित्तं निहन्त्याशु विबन्धं मलमूत्रयोः ।
अग्निमान्द्यभवात्रोगान् नाशयेदविकल्पतः ॥ २३ ॥
प्रमेहान्विंशतिं चैव सर्वदुर्नामनाशनम् ।
अविपत्तिकरं चूर्णमगस्त्यविहितं शुभम् ॥ २४ ॥

यह चूर्ण अम्लपित्त, मल मूत्रका विबन्ध, मन्दाग्निसे उत्पन्न होनेवाले रोग, बीसोंप्रकारके प्रमेह और सर्वप्रकारके बवासीरादि रोगोंको तत्काल नष्ट करता है । इस अविपत्तिकरनामक उत्तम चूर्णको अगस्त्यजीने विधान किया है ॥ २३ ॥ २४ ॥

लीलाविलास ।

रसो बलिव्योम रविश्च लौहं धात्र्यक्षनीरैस्त्रिदिनं विमर्द्य ।
तद्दल्पघृष्टं मृदु मार्कवेण संमर्दयेदस्य हि वह्नियुग्मम् ॥ २५ ॥