भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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पृष्ठ 1144

१११२ भैषज्यरत्नावली । [ अम्लपित्त-

६४ तोले पीपलोंको दसगुन जलमें पकावे। जब पकते पकते चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे। फिर उस क्वाथकी बराबर घृत, गिलोयका रस १ प्रस्थ, आमलोंका रस ६० पल एवं दाख, आँवले, परवल, सोंठ, कुटकी और वच इन सबका चार चार तोले कल्क लेकर एकत्रित करके उत्तम विधिसे घृतको सिद्ध करे ॥ २४ ॥ २५ ॥

अम्लपित्तहरं खाद्देद्दाहच्छर्द्दिनिवारणम् ।
असाध्यं साधयेत्सद्यो नाम्ना नारायणं घृतम् ॥ २६ ॥

इस घृतको सेवन करनेसे अम्लपित्त, दाह और वमन होना दूर होती है। यह नारायणनामवाला घृत असाध्यरोगको भी तत्काल नष्ट करता है ॥ २६ ॥

अम्लपित्तरोगमें पथ्य ।

ऊर्ध्वगे वमनं पूर्वमधोगे तु विरेचनम् ।
सर्वत्र शस्यते पश्चान्निरूहश्चापि शालयः ॥ २७ ॥
यवगोधूममुद्गाश्च पुराणो जाङ्गलो रसः ।
जलानि तप्तशीतानि शर्करामधुसक्तवः ॥ २८ ॥
कर्कोटकं कारवेल्लं पटोलं हिलमोचिका ।
वेत्राग्रं वृद्धकूष्माण्डं रम्भापुष्पं च वास्तुकम् ॥ २९ ॥
कपित्थं दाडिमं धात्री तिक्तानि सकलानि च ।
अम्लपित्तामये नित्यं सेवितव्यानि मानवैः ॥ १३० ॥

ऊर्ध्वगत अम्लपित्तरोगमें प्रथम वमन और अधोगत अम्लपित्तमें विरेचन कराकर पश्चात दोनों प्रकारके अम्लपित्तमें निरूहवस्तिका प्रयोग करना चाहिये। पुराने शालिचावल जौ गेहूँ मूँग जाङ्गलजातप्राणियोंका मांसरस औटाकर शीतल कियाहुआ जल खाँड और शहद मिलेहुए सत्तू बेल करेला परवल हुलहुलका शाक बेंतकी कोंपल पकापेठा केलेका मोचा बथुआ कैथ अनार आमले और सर्व प्रकारके तिक्तरसयुक्त पदार्थ; ये सब अम्लपित्तरोगमें प्रतिदिन सेवन करने चाहिये ॥ २७–१३० ॥

अम्लपित्तरोगमें अपथ्य ।

नवान्नानि विरुद्धानि कफपित्तकराणि च ।
वमिवेगं तिलान्माषान् कुलत्थांस्तैलभक्षणम् ॥ १३१ ॥
अविदुग्धं च धान्याम्लं लवणाम्लकटूनि च ।
गुर्वन्नं दधि मद्यं च वर्जयेदम्लपित्तवान् ॥ १३२ ॥