भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११२० भैषज्यरत्नावली । [ मसूरिका-
व्युषितं वारि सक्षौद्रं पीतं दाहगुडीहरम् ॥ ११ ॥ बासीजल और शहद एकत्र मिलाकर पीनेसे मसूरिकाकी दाह और गूमडियें दूर होती हैं ॥ ११ ॥
तर्पणं वातजायां प्राक् लाजचूर्णैः सशर्करैः । भोजनं तिक्तयूषैश्च प्रतुदानां रसेन वा ॥ १२ ॥ वातज मसूरिकामें प्रथम खीलोंके चूर्णमें खाँड मिलाकर तृप्तिके लिये देवे । तथा कडवेद्रव्योंके यूष और प्रतुद (जो पृथ्वी खुरच खुरच कर या चोंचोंसे वितरित-कर खाते हैं) पक्षियोंके मांसरसके साथ भोजन करावे ॥ १२ ॥
सौवीरेण तु संपिष्टं मातुलुङ्गस्य केशरम् ॥ प्रलेपात्पातयन्त्याशु दाहं चाशु नियच्छति ॥ १३ ॥ बिजौरेनींबूकी केशरको काँजीमें पीसकर लेप करनेसे मसूरिकारोग और उसकी दाह शीघ्र नष्ट होती है ॥ १३ ॥
पाददाहं प्रकुरुते पिडका पादसम्भवा । तत्र सेकं प्रशंसन्ति बहुशस्तण्डुलाम्बुना ॥ १४ ॥ पैरोंमें मसूरिकाकी गूमडियें उत्पन्न होनेसे पैरोंमें दाह होती है उसको दूर करनेके लिये चावलोंके पानीसे बारबार सेंकना चाहिये ॥ १४ ॥
पाककाले तु सर्वांस्ता विशोषयति मारुतः । तस्मात्संरूंहणं कार्यं न तु पथ्यं विशोषणम् ॥ १५ ॥ मसूरिकाके पकनेके समय वायु उसकी गूमडियोंको सुखा देता है । उस समय वायु शमन करनेके लिये रोगीको पौष्टिक आहार देवे । पथ्य द्रव्य और शोषण क्रिया नहीं करे ॥ १५ ॥
गुडूचीं मधुकं द्राक्षां मोरटं डिमैः सह । पाककाले तु दातव्यं भेषजं गुडसंयुक्तम् ॥ तेन पाकं व्रजत्याशु न च वायुः प्रकुप्यति ॥ १६ ॥ मसूरिकाके पकते समय गिलोय, मुलहठी, दाख, ईखकी जड और अनारदाना इन औषधियोंके क्वाथमें गुड डालकर पान करावे । इसमें मसूरिका शीघ्र पकजाती है और वायु कुपित नहीं होता ॥ १६ ॥
लिहेद्वा बादरं चूर्ण पाचनार्थं गुडेन तु । अनेनाशु विपच्यन्ते वातपित्तकफात्मिकाः ॥ १७ ॥