भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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पृष्ठ 1154

११२२ भैषज्यरत्नावली । [मसूरिका-

सगुग्गुलुं वराक्वाथं युञ्ज्याद्वा खदिराष्टकम् । कृष्णाभयारजो लिह्यान्मधुना कण्ठशुद्धये ॥ तथाऽष्टाङ्गावलेहश्च कवलश्चार्द्रकादिभिः ॥ २४ ॥ कीडे पडनेके भयसे सरलवृक्षकी धूप देवे तो इससे कीडे उत्पन्न नहीं होते । एवं मसूरिकाकी पीडा और दाहकी शान्तिके लिये तथा सुत (फुन्सियों) के झरनेकी शुद्धिकें लिये त्रिफलेके क्वाथको शुद्ध गूगलमें मिलाकर सेवन करे । अथवा खदिराष्टक क्वाथको पान करे या पीपल और हरडके चूर्णको शहदमें मिलाकर कण्ठकी शुद्धिके लिये चाटे तथा अष्टाङ्गावलेहके खानेसे और अदरख आदिका कवल धारण करनेसे भी कण्ठकी शुद्धि होती है ॥ २३ ॥ २४ ॥

पञ्चतिक्तं प्रयुञ्जीत पानाभ्यञ्जनभोजनैः । कुर्याद् व्रणविधानं च तैलादीन्वर्जयेच्चिरम् ॥ २५ ॥ पान, अभ्यङ्ग और भोजनके वास्ते कुष्ठाधिकारोक्त पञ्चतिक्त घृत प्रयोग करे और व्रणरोगकी विधिके अनुसार चिकित्सा करे । इस रोगमें तैलादि द्रव्य सर्वथा त्याज्य हैं ॥ २५ ॥

घण्टाकर्णं शिवं गौरीं विष्णुं विप्रं च पूजयेत् । आचरेज्जपहोमादीन्व्रतं रोगनिवृत्तये ॥ २६ ॥ इस रोगमें घण्टाकर्ण, शिव, पार्वती, विष्णु भगवान् और ब्राह्मणोंको पूजे । एवं जप, होमादि अनुष्ठान और मसूरिकारोगकी शान्तिके लिये व्रतादि करे ॥ २६ ॥

अगदानि विषघ्नानि रत्नानि विविधानि च । धारयेद्वाचयेच्चापि वैनतेयस्य संहिताम् ॥ २७ ॥ तदनन्तर रोगनाशक और विषहरण भाँतिभाँतिके रत्नोंको धारण करे और गरुडपुराणका पाठ करे ॥ २७ ॥

तेषु दुष्टव्रणेष्वेव जलौकाभिर्हरेदसृक् । व्रणशोथहरं योगमाचरेत्तत्प्रशान्तये ॥ २८ ॥ दुष्टव्रण होजानेपर जोंक लगवाकर रुधिर निकलवावे और व्रणकी सूजनको दूर करनेके लिये शोथनाशक चिकित्सा करे ॥ २८ ॥

विषघ्नैः सिद्धमन्त्रैश्च प्रमृज्यात्तु पुनः पुनः । भक्त्या पठेत्पाठयच्च शीतलायाः स्तवं शुभम् ॥ २९ ॥ विषको हरण करनेवाले सिद्धमन्त्रोंसे बारबार मार्जन करे और श्रद्धाभक्तिसे शीतलाके शुभ स्तोत्रको स्वयं पढे तथा दूसरोंसे पढावे ॥ २९ ॥