भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११२४ भैषज्यरत्नावली । [ मसूरिका-
अक्ष्णोः सेकविधौ गवेधुमधुकोद्भूतं सुशीतोदकं
शम्बूकोदरकोषनीरमपि वा कर्पूरचूर्णानि वा ॥ ३६ ॥
मसूरिका रोगमें प्रथम लंघन, वमन, विरेचन, शिरावेध कराना ( फस्तखुलवाना ) चाहिये । पश्चात् निर्मल चन्द्रमाकी कान्तिके समान उज्ज्वल पुराने साँठी और शालिधानोंके चावल, चने, मूँग, मसूर, जौ तथा कबूतर, चिड़िया, दात्यूह ( पक्षिविशेष ) अथवा पपैहा, कुररपक्षी, चकोर, तोता और अन्य सर्व प्रकारके प्रतुद ( चोंचसे फोड़कर खानेवाले, कौआ, मोर, श्येनादि ) पक्षियोंका मांस, पटोलपात, करेला, ढाकके बीज, ककोड़ा, कच्चा केला, सहिंजना, बिजौरानीम्बू, दाख, अनार, पवित्र और पुष्टिकर अन्नपान, पकेहुए सूखे बेर और उडदोंका यूष इनका भोजन एवं गवेधु ( तृणधान्यविशेष ) और मुलहठीके द्वारा सिद्ध कियेहुए शीतल जलसे अथवा घोंघेके भीतरके जलसे आँखोंपर सेंक करना या कपूरका चूर्ण मिलाकर जलसे छींटे देने चाहिये ॥ ३५ ॥ ३६ ॥
पक्वे मुद्गरसोऽपि जाङ्गलरसः शालिक्षशाकं घृतं
निर्गुण्डीदलयक्षधूपविहितो धूपो मृदुर्मुक्तिः ।
शश्वद्गोमयभस्मगुग्गुलमथो शुष्के शिलापिष्टयो-
रालेपः पिचुमर्दपत्रनिशयोः शेषे व्रणोक्ताः क्रियाः ॥३७॥
इत्थं सर्वदशाविभागविहितं पथ्यं यथादोषतः
संयुक्तं मुदमातनोति नितरां नृणां मसूरीगदे ॥ ३८ ॥
पकीहुई मसूरिकामें मूँगका रस, जङ्गलीजीवोंका मांसरस, शान्तिशाक, घृत, सिद्धाल्हक पत्ते और राल इनका धूप बनाकर विधिपूर्वक धूनी देवे, शरीरपर निरन्तर उपलोंकी राख और गूगलको सूखी शिलपर पीसकर मर्दन करे। मसूरिकाकी फुन्सियोंके सूखजानेपर नीमके सूखे पत्ते और कच्ची हल्दीको पीसकर लेप करे, पश्चात् व्रणरोगोक्त चिकित्सा करे। इस प्रकार सब अवस्थाओंके विभागमें विधानकियेहुए पथ्यको यथादोषानुसार सेवन करनेसे मसूरिकायुक्त रोगियोंको आरोग्यरूपी आनन्दलाभ होता है ॥ ३७ ॥ ३८ ॥
मसूरिकारोगमें अपथ्य ।
रतिं स्वेदं श्रमं तैलं गुर्वन्नं क्रोधमातपम् ।
दुष्टाम्बु दुष्टपवनं विरुद्धान्यशनानि च ॥ ३९ ॥