भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
पृष्ठ 1163, कुल 1416 में से
संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११३१
काँछके बाहर निकल आनेपर गौकी चर्बीसे गुदाको निश्शंक होकर मले, फिर उसको भीतर प्रवेश करदेवे तो गुदभ्रंशरोग तत्काल नष्ट होता है ॥ ३२ ॥
मूषिकाणां वसाभिर्वा गुदे सम्यक् प्रलेपनम् ।
स्विन्नमूषिकमांसेन अथवा स्वेदयेद् गुदम् ॥ ३३ ॥
चुहियोंकी चर्बीसे गुदापर अच्छेप्रकार मालिश करे अथवा मूसोंके मांसको पकाकर उसके द्वारा स्वेद देकर गुदाको भीतर प्रविष्ट करदेवे ॥ ३३ ॥
चाङ्गेरीघृत ।
चाङ्गेरीकोलदध्यम्लनागरक्षारसंयुतम् ।
घृतमुक्तकथितं पेयं गुदभ्रंशरुजापहम् ॥
शुण्ठीक्षारावत्र कल्कौ शिष्टस्तु द्रवमिष्यते ॥ ३४ ॥
अम्लनोनियाका रस, सूखे बेरोंका क्वाथ और खट्टा दही ये समान भाग मिश्रित ८ सेर, सोंठ और जवाखार इनका कल्क १ सेर तथा घृत दो सेर लेवे । सबको एकत्रकर विधिपूर्वक घृतको सिद्ध करे । इस घृतको पान करनेसे गुदभ्रंशरोग दूर होता है ॥ ३४ ॥
मूषिकाद्यतैल ।
क्षीरे महत्पञ्चमूलं मूषिकामन्त्रवर्जिताम् ।
पक्त्वा तस्मिन्पचेत्तैलं वातघ्नौषधसंयुतम् ॥
गुदभ्रंशमिदं तैलं पानाभ्यङ्गात्प्रसाधयेत् ॥ ३५ ॥
दूधमें बेल, शोनापाठा, कुम्मेर पाढर और अरणी इनकी छाल समान भाग तथा आँतों रहित चूहेका मांस डालकर पकावे । जब पकते पकते केवल दूध शेष रहजाय तब उसमें वातनाशक औषधियें डालकर तिलके तैलको पकावे । इस तेलको पीनेसे और मालिश करनेसे गुदभ्रंशरोग दूर होता है ॥ ३५ ॥
चर्मकील-जतुमणिआदिकी चिकित्सा ।
चर्मकीलं जतुमणिं मशकांस्तलकालकान् ।
उद्धृत्य शस्त्रेण दहेत्क्षाराग्निभ्यामशेषतः ॥ ३६ ॥
चर्मकील, जतुमणि, मशक और तिलकालकादि क्षुद्ररोगोंको शस्त्रसे काटकर क्षार और अग्निके द्वारा दग्ध करना चाहिये ॥ ३६ ॥
रुबुनालस्य चूर्णेन घर्षो मशकनाशनः ।
निर्मोकभस्मघर्षाद्वा मशः शान्तिं व्रजेद् ध्रुवम् ॥ ३७ ॥