भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११९९
हरड, बहेडा, आमला, सोंठ, मिरच, पीपल, सेंधानमक, मुलहठी, तूतिया, रसौत, घुण्डेरिया, वायविडंग, लोध और ताम्रभस्म इन चौदह औषधियोंको समान भाग लेकर एकत्र कूट पीसकर वर्षाके जलमें खरल करके बत्ती बनालेवे । पटना नगरमें इस बत्तीको श्रीनागार्जुनजीने शिलास्तम्भपर लिखा है ॥ ३० ॥
नाशिनी तिमिराणां च पटलानां विशेषतः ।
सद्यः प्रकोपं स्तन्येन स्त्रिया विजयते ध्रुवम् ॥ ३१ ॥
किंशुकस्वरसेनाथ पिष्टं पुष्पं च रक्तताम् ।
अञ्जनाल्लोध्रतोयेन आसन्नतिमिरं जयेत् ॥ ३२ ॥
चिरं सञ्छादिते नेत्रे बस्तमूत्रेण संयुता ।
उन्मीलयत्यकृच्छ्रेण प्रसादं चाधिगच्छति ॥ ३३ ॥
इसको स्त्रीके दूधमें घिसकर लगानेसे तिमिररोग, पटल रोग, विशेषकर नेत्रोंके समस्त रोगोंका निश्चय नाश होता है । टेसूके फूलोंके स्वरसमें घिसकर आँजनेसे पिल्ल, पुष्प और लाली दूर होती है, लोधके क्वाथमें मिश्रितकर लगानेसे आसन्न-तिमिर और बकरेके मूत्रमें घिसकर लगानेसे पुराना जाला और नेत्रोंका कठिनतासे मिचना दूर हो जाता है एवं दृष्टि अत्यन्त निर्मल होजाती है ॥ ३१–३३ ॥
व्योषाद्यञ्जन ।
व्योषायश्चूर्णसिन्धूत्थत्रिफलाञ्जनसंयुता ।
त्रिफलाजलसंपिष्टा कोकिला तिमिरापहा ॥ ३४ ॥
सोंठ, पीपल, मिरच, लोहभस्म, सेंधानोन, त्रिफला और काला सुरमा इनको समान भाग लेकर त्रिफलेके क्वाथमें खरलकर बत्ती बनालेवे । इस बत्तीको घिसकर नेत्रोंमें आँजनेसे कोकिला और तिमिररोग दूर होता है ॥ ३४ ॥
त्रिकट्वाद्यञ्जन ।
त्रीणि कटूनि करञ्जफलानि द्वे च निशे सह सैन्धवकं च ।
बिल्वतरोर्वरुणस्य च मूलं वारिचरं दशमं प्रवदन्ति ॥ ३५ ॥
सोंठ, मिरच, पीपल, करञ्जके फल, हल्दी, दारुहल्दी, सेंधानमक, बेलकी जड, वरनाकी जड और शंखनाभि इन दशों औषधोंको समान भाग लेकर जलमें पीसकर अञ्जन बनालेवे ॥ ३५ ॥
हन्ति तमस्तिमिरं पटलं वै पिच्चिटशुक्रमथार्बुदकं च ।
अञ्जनकं जनरञ्जनकं च दृङ् न विनश्यति वर्षशतेऽपि ॥ ३६ ॥