भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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पृष्ठ 1233

[चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १२०१

चन्द्रोदयावर्त्ति ।

हरीतकी वचा कुष्ठं पिप्पली मरिचानि च ।
विभीतकस्य मज्जा च शंखनाभिर्मनःशिला ॥
सर्वमेतत्समाहृत्य च्छागीक्षीरेण पेषयेत् ॥ ४१ ॥
हरड, वच, कूट, पीपल, मिरच, बहेड़ेकी गुठलीकी मींग, शंखनाभि और मैन-सिल सबको समान भाग लेकर, बकरीके दूधमें खरल करके बत्ती बनालेवे ॥

नाशयेत्तिमिरं कण्डूं पटलान्यर्बुदानि च ।
अधिकानि च मांसानि यश्च रात्रौ न पश्यति ॥ ४२ ॥
अपि द्विवार्षिकं पुष्पं मासेनेकेन नश्यति ।
वर्त्तिश्चन्द्रोदया नाम नृणां दृष्टिप्रसादनी ॥ ४३ ॥
यह चन्द्रोदयानामवाली बत्ती निरन्तर प्रयोग करनेसे तिमिर, कण्डू, पटल, अर्बुद, अधिमांस, रात्यन्ध, और जो दो वर्षकाभी होगया हो ऐसे पुष्प आदि नेत्ररोगोंको एक मासमेंही नष्ट कर देती है और दृष्टिको प्रसन्न करती है ॥४२॥४३॥

कुमारिकावर्त्ति ।

अशीतिस्तिलपुष्पाणि षष्टिः पिप्पलितण्डुलाः ।
जातिपुष्पाणि पञ्चाशन्मरिचानि च षोडश ॥
एषा कुमारिकावर्त्तिर्गतं चक्षुर्निवर्त्तयेत् ॥ ४४ ॥
तिलके फूल ८०, पीपलके चावल, ६०, चमेलीके फूल ५० और कालीमिरचें १६ लेवे । सबको एकत्रकर जलके साथ खरल करके बत्ती बनालेवे । यह कुमारिका बत्ती आँजनेसे नष्ट हुए नेत्रोंको फिर दोबारा दीप्तिमान् बनादेती है ॥

दृष्टिप्रदावर्त्ति ।

त्रिफलाकुक्कुटाण्डत्वक्कासीसमयसो रजः ।
नीलोत्पलं विडङ्गानि फेनं च सरितां पतेः ॥ ४५ ॥
आजेन पयसा पिष्ट्वा भावयेत्ताम्रभाजने ।
सप्तरात्रस्थितो भूयः पिष्ट्वा क्षीरेण वर्त्तयेत् ॥
एषा दृष्टिप्रदा वर्त्तिरन्धस्यामित्रचक्षुषः ॥ ४६ ॥
हरड, बहेडा, आमला, मुर्गीके अण्डेके छिल्के, हीराकसीस, लोहचूर्ण, नीलोफर वायविडङ्ग और समुद्रफेन इन सबको समान भाग लेकर बकरीके दूधके साथ

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