भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| १२०६ | भैषज्यरत्नावली । | [ नेत्ररोग- |
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घ्राणकर्णाक्षिवर्त्मत्वङ्मुखरोगव्रणापहम् ।
कामलाकुष्ठवीसर्पगण्डमालापहं परम् ॥ ७२ ॥
पटोलपात, कुटकी, दारुहल्दी, निम्बकी छाल, अडूसेकी छाल, त्रिफला, धमासा, पित्तपापडा और त्रायमाणालता प्रत्येकका चूर्ण ४-४ तोले एवं सूखे आमले १ प्रस्थ लेवे। सबको एकत्रकर १ द्रोण जलमें पकावे। जब पकते ३ चौथाईभाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे। फिर उसमें घृत एक प्रस्थ एवं चिरायता, कुडेकी छाल, नागरमोथा, मुलहठी, लालचन्दन और पीपल इन सबका समान भाग मिश्रित कल्क एक सेर डालकर विधिपूर्वक घृतको पकालेवे। यह घृत नेत्रोंको परम हितकारी है एवं नाक, कान, अक्षिवर्त्म, त्वचा और मुख इनके रोग, व्रण, कामला, कूठ, विसर्प, गण्डमालाआदि रोगोंको शीघ्र नष्ट करता है ॥ ६९-७२ ॥
शशकाद्यघृत ।
शशकस्य कषाये तु सर्पिषः कुडवं पचेत् ।
यष्टिप्रपौण्डरीकस्य कल्केन पयसा समम् ॥ ७३ ॥
छागल्याः पूरणाच्छुक्रक्षतपाकात्ययाजकाः ।
हन्ति भ्रूशंखमूलं च दाहरोगं विशेषतः ॥ ७४ ॥
खरगोशके एक सेर क्वाथमें घी १६ तोले, मुलहठी और पुण्डेरियाका कल्क चारचार तोले तथा बकरीका दूध एकसेर डालकर उत्तम प्रकार घृतको सिद्ध करे। इस घृतको नेत्रोंमें आँजनेसे शुक्र, छत, पाकात्यय, अजका, भ्रूशंखमूल और विशेषकर दाहरोग नष्ट होता है ॥ ७३ ॥ ७४ ॥
त्रिफलाद्यघृत १-२ ।
फलत्रिकाभीरुकषायसिद्धं कल्केन यष्टीमधुकस्य युक्तम् ।
सर्पिःसमं क्षौद्रचतुर्थभागं हन्यात्त्रिदोषं तिमिरं प्रवृद्धम् ॥७५॥
हरड, बहेडा और आमला इनका क्वाथ ८ सेर, शतावरका स्वरस दो सेर और मुलहठीका कल्क एक सेर सबको एकत्र मिलाकर विधिपूर्वक दोसेर घृतको सिद्ध करे। जब उत्तम प्रकार पककर सिद्ध होजाय तब नीचे उतारकर शीतल होजानेपर उसमें घीसे चौथाई भाग शहद मिलादेवे। यह घृत अत्यन्त प्रबल त्रिदोषज तिमिररोगको नष्ट करता है ॥ ७५ ॥
त्रिफला त्र्यूषणं द्राक्षा मधुकं कटुरोहिणी ।
प्रपौण्डरीकं सूक्ष्मैला विडङ्गं नागकेशरम् ॥ ७६ ॥