भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१२०८ भैषज्यरत्नावली । [ नेत्ररोग-
कल्कः कणा सिता द्राक्षा त्रिफला नीलमुत्पलम् ।
मधुकं क्षीरकाकोली मधुपर्णी निदिग्धिका ॥ ८४ ॥
तत्साधु सिद्धं विज्ञाय शुभे भाण्डे निधापयेत् ।
ऊर्ध्वपानमधःपानं मध्ये पानं च शस्यते ॥ ८५ ॥
त्रिफलेका क्वाथ १ प्रस्थ, भाँगरेका रस, १ प्रस्थ, अडूसेका रस १ प्रस्थ, शतावरका रस १ प्रस्थ, बकरीका दूध १ प्रस्थ, गिलोयका रस १ प्रस्थ और आमलौंका रस १ प्रस्थ लेवे। सबको एकत्रकर इनमें एक प्रस्थ घी तथा पीपल, चीनी, दाख, त्रिफला, नीलकमल, मुलहठी, क्षीरकाकोली, गिलोय, कटेरी, इनके समान भाग मिलित कल्कको एक सेर डालकर यत्नपूर्वक घृतको पकावे । जब अच्छे प्रकार पककर, सिद्ध होजाय तब उसको उतारकर उत्तम पात्रमें भरकर रखदेवे । इस घृतको भोजन करनेसे पहले, मध्यमें और अन्तमें पान करना चाहिये ॥ ८२-८५ ॥
यावन्तो नेत्ररोगास्तान् पानादेवापकर्षति ।
रक्तजे रक्तदुष्टे च रक्ते चातिस्रुतेऽपि च ॥ ८६ ॥
नक्तान्ध्ये तिमिरे काचे नीलिकापटलार्बुदे ।
अभिष्यन्देऽधिमन्थे च पक्ष्मकोपे च दारुणे ॥ ८७ ॥
नेत्ररोगेषु सर्वेषु वातपित्तकफेषु च ।
अदृष्टिं मन्ददृष्टिं च कफवातप्रदूषिताम् ॥ ८८ ॥
स्रवतो वातपित्ताभ्यां सकण्डूवासन्नदूरदृक् ।
गृध्रदृष्टिकरं सद्यो बलवर्णाग्निवर्धनम् ॥
सर्वनेत्रामयं हन्यात्त्रिफलाद्यं महद् घृतम् ॥ ८९ ॥
यह घृत नेत्रसंबंधी जितने रोग हैं उन सबको पान करतेही नष्ट करदेता है । रक्तज नेत्ररोग, दूषितरक्त, रक्तस्राव, रतौंधा, तिमिर, काच, नीलिका, पटल, अर्बुद, अभिष्यन्द, अधिमन्थ, दारुण पक्ष्मरोग, वातज, पित्तज और कफजादि सर्व प्रकार के चक्षुरोगोंमें यह घृत विशेष उपयोगी है तथा अन्धता, मन्ददृष्टि, कफ और वातसे दूषित दृष्टि, नेत्रस्राव, वातपित्तजन्य खुजली और समीपवर्ती वस्तुका दूर दीखना इत्यादि विकारोंको दूर करके तत्काल गिद्धकीसी दृष्टि करदेता है । इससे बल, वर्ण और अग्निकी वृद्धि होती है । यह महात्रिफलाद्यघृत सर्वप्रकारके नेत्ररोगों को नष्ट करता है ॥ ८६-८९ ॥