भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| १२१० | भैषज्यरत्नावली । | [ नेत्ररोग- |
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शेष विधि भृङ्गराजादितैलकी समान करनी चाहिये । यह शीघ्र सिद्धफलकों देनेवाला है ॥ ९३–९६ ॥
भृङ्गराजतैल ।
भृङ्गराजरसप्रस्थे यष्टीमधुपलेन च ।
तैलस्य कुडवं पक्वं सद्यो दृष्टिं प्रसाद्येत् ॥
नस्याद्वलीपलीतघ्नं मासेनैतन्न संशयः ॥ ९७ ॥
भाँगरेके एक प्रस्थ रसमें मुलहठीका कल्क चार तोले और तिलका तैल एक कुडव ( १६ तोले ) डालकर विधिपूर्वक पकावे । इस तेलकी नास लेनेसे वली और पलितरोग एक मासमें ही निस्सन्देह नष्ट होजाते हैं तथा दृष्टिशक्ति प्रसन्न होती है ॥ ९७ ॥
नेत्ररोगमें पथ्य ।
आश्चयोतनं लंघनमञ्जनं च स्वेदो विरेकः प्रतिसारणं च ।
प्रपूरणं नस्यमसृग्विमोक्षः शस्त्रक्रिया लेपनमाज्यपानम् ॥ ९८॥
सेको मनोनिर्वृतिरङ्घ्रिपूजा मुद्गा यवा लोहितशालयश्च ।
लावो मयूरो वनकुक्कुटश्च कूर्मः कुलिङ्गोऽपि कपिञ्जलश्च ॥ ९९॥
कौम्भं हविर्वन्यकुलत्थयूषः पेया विलेपी लशुनं पटोलम् ।
वार्त्ताकुकर्कोटककारवेल्लं नवीनमोचं नवमूलकं च ॥ २०० ॥
पुनर्नवामार्कवकाकमाचीपत्चूरशाकानि कुमारिका च ।
द्राक्षा च कुस्तुम्बुरु माणिमन्थं लोध्रं वराक्षौद्रमुपानहश्च २०१
नारीपयश्चन्दनमिन्दुखण्डं तिक्तानि सर्वाणि लघूनि चापि ।
विजानता पथ्यमिदं प्रयुक्तं यथामलं नेत्रगदान्निहन्ति २०२ ॥
आश्च्योतन ( नेत्रोंमें औषधि टपकाना ), लंघन करना, अञ्जन आँजना, स्वेद, विरेचन, प्रतिसारण, नेत्रोंमें औषधि भरना, नस्य, रक्तमोक्षण, शस्त्र-कर्म, प्रलेप, घृतपान, परिषेचन, मनकी स्थिरता, दोनों पैरोंको जलसे धोकर और पोछकर साफ रखना, मूँग, जो लालशालिके चावल, लवा, मोर, जङ्गली मुर्गा, कछुआ, केंकडा और कपिञ्जल आदि जीवोंका मांस, पुराना घी, वन-कुलथीका यूष, पेया, विलेपी, लहसुन, परवल, बैंगन, ककोडे, करेला, केलेका नया मोचा, कच्ची मूली, पुनर्नवा, भाँगरा, मकोय, शान्तिशाक, घीग्वार, दाख, धनियाँ, सेंधानमक, लोध, त्रिफला, शहद, खडाऊँ पहनना, स्त्रीका