भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

पृष्ठ 1244, कुल 1416 में से

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पृष्ठ 1244
१२१२भैषज्यरत्नावली ।[शिरोरोग-

कुष्ठमेरण्डमूलं च लेपात्काञ्जिकयोजितम् ।
शिरोऽर्त्तिं नाशयत्याशु पुष्पं वा मुचुकुन्दजम् ॥ २ ॥
कूठ और अण्डकी जडको काँजीके साथ पीसकर लेप करनेसे अथवा मुचुकुन्दकें फूलोंको पीसकर लेप करनेसे शिरकी पीडा तत्काल दूर होती है ॥ २ ॥

पैत्ते घृतं पयः सेकाः शीतलेपाः सनावनाः ।
जीवनीयानि सर्पींषि पानान्नं चापि पित्तनुत् ॥ ३ ॥
पित्तज शिरोरोगमें घी और दूधका पान, शीतल द्रव्योंद्वारा सेचन, शीतल द्रव्यों का लेप, नस्य, जीवनीयगणोक्त औषधियोंके द्वारा सिद्धकियाहुआ घृतपान और पित्तनाशक अन्न-पान प्रयोग करने चाहिये ॥ ३ ॥

कफजे लङ्घनं स्वेदो रूक्षोष्णैः पाचनात्मकैः ।
तीक्ष्णावपीडधूमाश्च तीक्ष्णाश्च कवलग्रहाः ॥ ४ ॥
कफज शिरोरोगमें लङ्घन, रूक्ष और उष्ण द्रव्योंसे परिषेक, दशमूलादिपाचन तीक्ष्णद्रव्योंद्वारा नस्य, धूम और कवल धारण करना चाहिये ॥ ४ ॥

सूर्यावर्त्तकी चिकित्सा ।

सूर्यावर्त्तभवं बीजं तद्रसेन सुपेषितम् ।
वेदनानाशनो लेपः सूर्यावर्त्तार्द्धभेदयोः ॥ ५ ॥
हुरहुरके बीजोंको हुरहुरके पत्तोंके रसमें पीसकर लेप करनेसे सूर्यावर्त्त और अर्द्धावभेदक शिरोरोगकी वेदना नष्ट होती है ॥ ५ ॥

सूर्यावर्त्ते विधातव्यं नस्यकर्म्मादिभेषजम् ।
पाययेत्सगुडं सर्पिर्घृतपूरांश्च भोजयेत् ॥ ६ ॥
सूर्यावर्त्तरोगमें औषधियोंका नस्य देकर गुड मिलाहुआ घृत पान करें और घीसे भरेहुए मालपुओंको भक्षण करे ॥ ६ ॥

सूर्यावर्त्ते शिरोवेधो नावनं क्षीरसर्पिषा ।
हितः क्षीरघृताभ्यांसस्ताभ्यां चैव विरेचनम् ॥ ७ ॥
सूर्यावर्त्तनामक शिरोरोगमें शिराको वेधना, दूधमेंसे निकलेहुए मक्खनद्वारा नास लेना, दूध और घीको पीना एवं दुग्ध, घृतके साथ ही शिरोविरेचक औषधि देकर नस्य प्रयोग करना हितकारी है ॥ ७ ॥

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