भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १२२३


महाकनकतैल ।

कनकस्य रसप्रस्थं प्रस्थं वर्षाभुवस्तथा ।
निर्गुण्डीस्वरसप्रस्थं दशमूलरसस्य च ॥ ७२ ॥
पारिभद्ररसप्रस्थं प्रस्थं वरुणकस्य च ।
तैलप्रस्थं समादाय भिषग् यत्नाद्विपाचयेत् ॥ ७३ ॥
कल्कैर्द्विपलिकैरेतैः शुण्ठीमरिचसैन्धवैः ।
पुनर्नवा कर्कटकशेलुत्वक्पिप्पलीयुगैः ॥
तत्साधु सिद्धं विज्ञाय शुभे पात्रे निधापयेत् ॥ ७४ ॥

धतूरेका रस, पुनर्नवेका रस, निर्गुण्डीका रस, दशमूलका क्वाथ, फरहदका रस और बरनाकी छालका क्वाथ इन सबको अलग अलग एक एक प्रस्थ लेवे। सबको एकत्रकर इनमें सरसोंका तेल १ प्रस्थ तथा सोंठ, मिरच, सेंधानमक, पुनर्नवा काकड़ासिंगी, लहसौडेके वृक्ष की छाल, पीपल और गजपीपल इन प्रत्येकका कल्क दो दो तोले डालकर तेलको पकावे। जब अच्छे प्रकार पककर सिद्ध होजाय तब उतारकर स्वच्छपात्रमें भरकर रखदेवे ॥ ७२-७४ ॥

वातश्लेष्मकृतं सर्वमामवातं भगन्दरम् ।
सन्निपातभवं रोगं शोथमाशु विनाशयेत् ॥ ७५ ॥
ये केचिद्गदा वयः सन्ति श्लैष्मिकाः सान्निपातिकाः ।
तान्सर्वानाशयत्याशु सूर्यस्तम इवोदितः ॥ ७६ ॥

यह तेल वात कफजन्यरोग, आमवात, भगन्दर, सन्निपातज रोग और शोथको दूर करता है तथा कफसे और सन्निपातसे होनेवाले जितने रोग हैं उन सबको यह तेल सेवन करतेही इसप्रकार नष्ट करता है जिसप्रकार उदय हुआ सूर्य अपने तेजःपुञ्जसे अन्धकार समूहको तत्क्षण नष्ट करदेता है ॥७५॥७६ ॥

रुद्रतैल ।

जैपालद्रोणधुस्तूरशिग्रुशकाशनस्य च।
सूर्यावर्त्तस्य सूर्यस्य पत्राणां स्वरसं पृथक् ॥ ७७ ॥
जम्बीरशृङ्गवेरस्य रसं दत्त्वा समं समम्
कटुतैलस्य पात्रं तु शोषयित्वा पचेद्भिषक् ॥ ७८ ॥
रजनीद्वयमञ्जिष्ठा कट्फलं कृष्णजीरकम् ।
त्रिकटुः पिप्पलीमूलं शारिवे द्वे विडङ्गकम् ॥ ७९ ॥

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