भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १२४७
नष्टपुष्पे नष्टशुके योनिशूले च शस्यते । ऋतुकाले क्लेदयोन्यां विशेषे चाममारुते ॥ एतात्रोगान्निहन्त्याशु भास्करस्तिमिरं यथा ॥ ३८ ॥
शुद्धपारा, शुद्धगन्धक, लोहा, वङ्ग, सुहागा, चाँदी, अभ्रक और ताँबा इन प्रत्येक द्रव्यको चार-चार तोले लेकर गिलोय, त्रिफला, दन्तीकी जड, नील सिंहाळु, कटेरी, देवदारु, सेंधानमक, कूठ, बडीकटेरी, मकोय, तगर, तालीशपत्र, बेंतकी कोंपल, गोखुरू, अडूसा और खिरेंटी इन सबके स्वरस अथवा क्वाथमें तीन-तीन बार अलग अलग क्रमपूर्वक भावना देवे । पश्चात् जीवन्ती, मुलहठी, दन्ती, लौंग, बंशलोचन, रास्ना और गोखुरूके बीज इनको चार-चार माशे लेकर चूर्ण करले और सबको एकत्र मिलाकर जयन्ती और तुलसीके रसमें उत्तमप्रकार खरलकर गोलियाँ बनालेवे । फिर इस रसको स्त्रियोंके रजके नष्ट होनेपर, वीर्य्यके नष्ट होजानेपर, योनिशूल, ऋतुकालगत शूल, क्लेदयुक्त योनि और आमवातरोगमें प्रयोग करना चाहिये । यह रस इन समस्त रोगोंको इसप्रकार नष्ट करदेता है जिसप्रकार सूर्य अन्धकारसमूहको ॥ ३३-३८ ॥
फलघृत ।
त्रिफलां द्वे सहचरे गुडूचीं सपुनर्नवाम् । शुकनासां हरिद्रे द्वे रास्नां मेदां शतावरीम् ॥ ३९ ॥ कल्कीकृत्य घृतप्रस्थं पचेत्क्षीरचतुर्गुणम् । तत्सिद्धं प्रपिबेन्नारी योनिशूलनिपीडिता ॥ ४० ॥
त्रिफला, नीलापियाबाँसा, पीलापियाबाँसा, गिलोय, पुनर्नवा, शोनापाठ, हल्दी, दारुहल्दी, रास्ना, मेदा और शतावर ये प्रत्येक दो दो तोले लेकर एकत्र पीसलेवे । फिर उस कल्कके सहयोगसे एक प्रस्थ घृतको चौगुने दूधमें पकावे । जब अच्छे प्रकार सिद्ध होजाय तब उस घृतको योनिशूलसे पीडित स्त्री पान करे ॥ ३९॥४० ॥
पिण्डिता चलिता या च निःसृता विवृता च या । पित्तयोनिश्च विस्रस्ता षण्ढयोनिश्च या स्मृता ॥ ४१ ॥ प्रपद्यन्ते तु ताः स्थानं गर्भं गृह्णन्ति चासकृत् । एतत्फलघृतं नाम योनिदोषहरं परम् ॥ ४२ ॥
इससे पिण्डाकार, चलायमान, बाहरको निकली हुई, भीतरको प्रविष्टहुई योनि, पित्तजयोनि, विस्रस्ता और षण्ढयोनि ये सर्वप्रकारकी योनियें यथास्थानको