भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१२५०. भैषज्यरत्नावली । [ योनिव्यापद् -
अस्य प्रयोगात्कुक्षिस्यस्फुटवन्ध्यां हरत्यपि ।
योनिदुष्टाश्च या नार्यो रेतोदुष्टाश्च ये नराः ॥ ५५ ॥
स्त्रीणां पुंसां दोषहरं घृतमेतदनुत्तमम् ।
वन्ध्यापि लभते पुत्रं शूरं पण्डितमानिनम् ॥ ५६ ॥
फिर गर्भवती स्त्री इस घृतको दूसरे महीनेसे प्रारंभकर छः महीनेतक पान करे तो सब रोगोंसे रहित, सर्वज्ञ पुत्रको उत्पन्न करती है । इस घृतको प्रयोग करनेसे कुक्षिस्य स्फुटवन्ध्यापन दूर होता है । यह उत्तम घृत स्त्रियोंके सर्वप्रकारके योनि-दोष तथा पुरुषोंके शुक्रदोषोंको हरता है । इसके सेवनसे बाँझ स्त्री भी शूर वीर और पण्डितमानी पुत्रको उत्पन्न करती है ॥ ५४-५६ ॥
जडगद्गदमूकत्वं पानादेवापकर्षति ।
सप्तरात्रप्रयोगेण नरः श्रुतधरो भवेत् ॥ ५७ ॥
नाग्निर्दहति तद्वेश्म न वज्रमुपहन्ति च ।
न तत्र म्रियते बालो यत्रास्ते सोमसंज्ञिकम् ॥ ५८ ॥
इस घृतको पान करतेही जडता, गद्गदवाणी और गूँगापन दूर होता है तथा ७ दिनतक सेवन करनेसे सुनीहुई बातको तत्काल धारण करनेकी शक्ति अर्थात् स्मरणशक्ति अत्यन्त तीव्र होजाती है । जिस घरमें यह सोमनामक घृत होता है उस गृहको अग्नि नहीं जलासकता और न वज्र आघात कर सकता है और उस गृहमें बालककी कभी मृत्यु नहीं होती है ॥ ५७ ॥ ५८ ॥
कुमारकल्पद्रुमघृत ।
पञ्चाशच्छागमांसस्य दशमूल्यास्तथैव च ।
जलमष्टगुणं दत्त्वा क्वाथेन मृदुनाऽग्निना ॥ ५९ ॥
चतुर्भागावशेषं च क्वाथं संगृह्य यत्नतः ।
गव्यं प्रस्थद्वयं सर्पिर्गृह्णीयात्कुशलो भिषक् ॥ ६० ॥
क्षीरं घृतसमं दद्यान्नारायण्या रसं तथा ।
ताम्रे वा मृन्मये पात्रे तदेकत्र पचेच्छनैः ॥ ६१ ॥
बकरेका मांस ५० पल और दशमूलकी सब औषधियाँ ५० पल लेकर अठगुने जलमें पकावे । जब पकते पकते चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर उस क्वाथमें नवीन गोघृत दो प्रस्थ, दूध दो प्रस्थ