भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१२६२ भैषज्यरत्नावली। [गार्भिणीरोग-
पीसकर और दूधमें मिलाकर पिलानी चाहिये। इससे गर्भोत्पन्नशूल और तत्सम्बन्धी दोष नष्ट होता है ॥ २३ ॥ २४ ॥
तथा चैकादशे मासि गर्भे भवति वेदना ।
मधुकं पद्मशं चैव मृणालं नीलमुत्पलम् ॥ २५ ॥
शीततोयेन पिष्ट्वा तु क्षीरेणालोड्य पाययेत् ।
तेनैव वेदनाऽतीव नाशमायाति सत्वरम् ॥ २६ ॥
क्षीरिकाञ्चोत्पलं कुष्ठं समङ्गामूलकं सिताम् ।
पिबेदेकादशे मासि गर्भिणी शूलशान्तये ॥ २७ ॥
ग्यारहवें महीनेमें जो गर्भमें पीडा हो तो उसमें मुलहठी, पद्माख, कमलकी नाल और नीलकमल ये औषधिये समानांश मिलित ले शीतल जलमें पीसकर और दूधमें मिलाकर गर्भिणी स्त्रीको पान करावे। इससे उक्त मासकी दारुण पीडा तत्काल शमन होती है तथा गर्भशूलको निवारण करनेके लिये गर्भवती स्त्री क्षीरकाकोली, नीलकमल, कूठ, वराहक्रान्ताकी जड और मिश्री इनको एकत्र पीसकर दूधके साथ मिलाकर पान करे ॥ २५-२७ ॥
सिता विदारी काकोली तथा क्षीरविदारिका ।
गर्भिणी द्वादशे मासि पिबेच्छूलघ्नमौषधम् ॥ २८ ॥
बारहवें महीनेमें गर्भवाली स्त्री गर्भकी पीडाको निवारणार्थ मिश्री विदारीकन्द, काकोली और क्षीरकाकोली इन औषधियोंको समान भाग लेकल जलमें पीसकर पान करे ॥ २८ ॥
मधुकं शाकबीजं च पयसा सुरदारु च ।
अश्मन्तकं कृष्णतिलस्ताम्रवल्ली शतावरी ॥ २९ ॥
वृक्षादनी पयस्या च तथैवोत्पलशारिवा ।
अनन्ता शारिवा रास्ना मधुकं पद्ममेव च ॥ ३० ॥
बृहतीद्वयकाश्मर्यक्षीरिशुङ्गास्त्वचो बिसम् ।
पृश्निपर्णी बला शिग्रु श्वदंष्ट्रा मधुयष्टिका ॥ ३१ ॥
शृङ्गाटकं बिसं द्राक्षा कशेरु मधुकं सिता ।
मासेषु सप्त योगाः स्युरर्द्धश्लोकसमापकाः ॥
यथाक्रमं प्रयोक्तव्या गर्भस्रावे पयोऽन्विताः ॥ ३२ ॥