भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| १२७८ | भैषज्यरत्नावली । | [ सूतिकारोग- |
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एक कर्ष अथवा दो कर्ष परिमाणतक सेवन करे। यह सौभाग्यशुण्ठी अग्निको दीपन करती है एवं सूतिकारोग, सब प्रकारके अतीसार और स्त्रियोंकी संग्रहणीकों हरती है ऐसा भिषगाचार्योंने कहा है ॥
त्रिकटु त्रिफलाऽजाजी चातुर्जातकमुस्तकम् ।
जातीकोषफलं धान्यं लवङ्गं शतपुष्पिका ॥ ३० ॥
नलिका मादनफलं यमानीद्वयधातकी ।
शतावरी तालमूली लोध्रं वारणपिप्पली ॥ ३१ ॥
पियालबीजममृता कर्पूरं चन्दनद्वयम् ।
कर्षप्रमाणान्येतेषां श्लक्ष्णचूर्णानि कारयेत् ॥ ३२ ॥
नागरस्य च चूर्णस्य पलं षोडशकं क्षिपेत् ।
घृतमष्टपलं दद्यात्क्षीरप्रस्थद्वयं तथा ॥ ३३ ॥
सार्द्धप्रस्थद्वयं चात्र शर्करायास्ततः क्षिपेत् ।
दृढे च मृन्मये पात्रे पाचयेन्मृदुनाऽग्निना ॥
यत्नतः पाकविद्वैद्यो गुडिकां कारयेत्ततः ॥ ३४ ॥
२—सोंठ, मिरच, पीपल, हरड, बहेडा, आमला, कालाजीरा, दारचीनी, इलायची, तेजपात, नागकेशर, नागरमोथा, जावित्री, जायफल, धनियां, लौंग, सोया, नली, मैनफल, अजवायन, अजमोद, धायके फूल, शतावर, मूसली, लोध, गजपीपल, चिरौंजी, गिलोय, कपूर, सफेदचन्दन और लालचन्दन इन औषधियोंको दो दो तोले लेकर बारीक पीसलेवे। फिर सोंठका चूर्ण १६ पल, घी ८ पल, दूध दो प्रस्थ; और खाँड २॥ प्रस्थ लेवे। पाकविधिको जाननेवाला वैद्य यत्नपूर्वक सबको दृढ मिट्टीके पात्रमें एकत्र करके मन्दमन्द अग्निसे पकावे। जब पाक पककर गाढा होजाय तब उतारकर उसकी गोलियाँ बनालेवे ॥ ३०–३४ ॥
भक्षयेत्प्रातरुत्थाय अजाक्षीरं पिबेदनु ।
आमवातं निहन्त्याशु कासं श्वासं सपीनसम् ॥ ३५ ॥
ग्रहणीमम्लपित्तं च रक्तपित्तं क्षतक्षयम् ।
स्त्रीरोगान्विंशतिं चैव तत्क्षणादेव नाशयेत् ॥ ३६ ॥
अहन्यहनि च स्त्रीणां स्तनदार्ढ्यकरं परम् ।
सौभाग्यजननं स्त्रीणां पुष्टिदं धातुवर्द्धनम् ॥ ३७ ॥