भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१२८२ भैषज्यरत्नावली । [ सूतिकारोग-
इसको नित्यप्रति सेवन करनेसे स्त्रियें अलक्ष्मी और मलसे रहित होकर पुष्ट और उन्नतस्तनोंवाली तथा कमलपत्रके समान सुंदर नेत्रोंवाली होजाती हैं ॥५६-५८॥
जीरकाद्यमोदक।
जीरकस्य पलान्यष्टौ शुण्ठी धान्यं पलत्रयम् ।
शतपुष्पा यमानी च कृष्णजीरं पलं पलम् ॥ ५९ ॥
क्षीरद्विप्रस्थसंयुक्तं खण्डस्यार्द्धशतं पलम् ।
घृतस्यापि पलान्यष्टौ शनैर्मृद्वग्निना पचेत् ॥ ६० ॥
जीरा ८ पल, सोंठ ३ पल, धनियाँ ३ पल तथा सोया, अजवायन और कालाजीरा प्रत्येक चार चार तोले, दूध २ प्रस्थ, खाँड ५० पल और घी ८ पल लेवे, सबको विधिपूर्वक एकत्र मिलाकर मन्दमन्द अग्निसे पकावे ॥ ५९-६० ॥
व्योषं त्रिजातकं चैव विडङ्गं चव्यचित्रकम् ।
मुस्तकं च लवङ्गं च पलांशं संप्रकल्पयेत् ॥ ६१ ॥
मन्देन वह्निना पक्त्वा मोदकं कारयेद्भिषक् ।
सर्वयोषिद्विकाराणां नाशनं वह्निदीपनम् ॥
सूतिकारोगशमनं विशेषाद्ग्रहणीहरम् ॥ ६२ ॥
जब पकते पकते पाक गाढा होजाय तब उसमें सोंठ, मिरच, पीपल, दारचीनी, इलायची, तेजपात, वायविडङ्ग, चव्य, चीता, नागरमोथा और लौंग इनके बारीक चूर्णको चार चार तोले परिमाण डालदेवे और मृदु अग्निसे पकाकर लड्डू बनालेवे । यह मोदक स्त्रियोंके सब रोगोंको नष्ट करते हैं और अग्निको प्रदीप्त करते हैं । विशेषकर सूतिकारोग और संग्रहणी रोगको हरनेवाले हैं ॥
सूतिकाविनोदरस।
रसगन्धकतुत्थं च त्र्यहं जम्बीरमर्दितम् ।
त्रिर्भावितं त्रिकटुना देयं गुञ्जाचतुष्टयम् ॥
गर्भिण्याः शूलविष्टम्भज्वराजीर्णेषु योजयेत् ॥ ६३ ॥
शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक और तूतिया इनको समान भाग लेकर तीन दिनतक जम्बीरीनींबुके रसमें खरल करके त्रिकुटके क्वाथमें तीन बार भावना देवे । पश्चात् चार चार रत्तीकी गोलियाँ बनाकर गर्भिणीस्त्रीके उल्लिखितरोगोंमें प्रयोग करे । यह रस शूल, विष्टम्भ, ज्वर और अजीर्णादिरोगोंमें परमोपयोगी है ॥ ६३ ॥