भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१२८४ भैषज्यरत्नावली । [सूतिकारोग-
रत्तीकी गोलियाँ बनाकर सेवन करे तो ज्वर, अतीसार और सूतिकारोग नष्ट होता है। इस सूतिकाघ्न रसको ब्रह्माजीने कथन किया है ॥ ६८ ॥ ६९ ॥
सूतिकाहररस।
लवङ्गं रसगन्धौ च यवक्षारं तथाऽभ्रकम् । लौहं ताम्रं सीसकं च पलमानं समाहरेत् ॥ ७० ॥ जातीफलं केशराजं वरैला भृङ्गमुस्तकम् । धातकीन्द्रयवं पाठा शृङ्गी बिल्वं च बालकम् ॥ ७१ ॥ कर्षमानं च सञ्चूर्ण्य सर्वमेकत्र कारयेत् । बदरास्थिप्रमाणेन वटिकां कारयेद्भिषक् ॥ ७२ ॥ गन्धालिकापत्ररसैरनुपानं प्रदापयेत् । सर्वातीसारहरणः सर्वशूलनिवारणः ॥ सूतिकाहरनामाऽयंसूतिकां नाशयेद् ध्रुवम् ॥ ७३ ॥
लौंग, शुद्ध पारा, गन्धक, जवाखार, अभ्रक, लोहा, तांबा और सीसा ये प्रत्येक चार चार तोले लेवे तथा जायफल, कुकुरभाँगरा, त्रिफला, इलायची, भाँगरा, नागरमोथा, धायके फूल, इन्द्रजौ, पाठ काकडासिंगी, बेलगिरी और सुगन्धवाला ये औषधियाँ दो दो तोले ले सबको कूट पीसकर और जलमें खरल कर इनकी बेर की गुटलीकी बराबर गोलियाँ बनालेवे। फिर प्रतिदिन पसरनके रसके साथ एक एक गोली सेवन करे तो सर्वप्रकारका अतीसार और सर्वशूल नष्ट होते हैं। यह रस सूतिकारोगको तो निश्चय नष्ट करता है ॥ ७०-७३ ॥
रसशार्दूल।
अभ्रं ताम्रं तथा लौहं राजपट्टं रसं तथा । गन्धटङ्कमरीचं च यवक्षारं समांशकम् ॥ ७४ ॥ तथाऽत्र तालकं चैव त्रिफलायाश्च तोलकम् । तोलकं चामृतं चैव षड्गुञ्जाप्रमिता वटी ॥ ७५ ॥ ग्रीष्मसुन्दरकस्यापि नागवल्लीरसेन च । भावयेत्सप्तधा हन्ति ज्वरकासाङ्गसंग्रहम् ॥ सूतिकातङ्कशोथादिस्त्रीरोगं च विनाशयेत् ॥ ७६ ॥
अभ्रक, ताँबा, लोहा, चुम्बकपत्थर, पारा, गन्धक, सुहागा, मिरच, जवाखार, हरिताल, त्रिफला और शुद्ध मीठातेलिया ये प्रत्येक एक एक तोला लेवे।