भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१३२६ भैषज्यरत्नावली । [ रसायन-
क्षयमेकादशविधं ग्रहणीं रक्तपित्तकम् । विविधान्वातजारोगाँश्चत्वारिंशच्च पैत्तिकान् ॥ ६६ ॥ हन्ति सर्वामयानेव कामिनीनां शतं व्रजेत् । एकविंशतिरात्रार्द्धं परिहार्यं त्यजेदिह ॥ ६७ ॥ यथेष्टाहारचेष्टो हि कन्दर्पसदृशो नरः । मेधावी बलवान्प्राज्ञो बह्वाशी भीमविक्रमः ॥ ६८ ॥ पुत्रार्थिनी तथा नारी सैव पुत्रं प्रसूयते ॥ अस्य सूतस्य माहात्म्यं वेत्ति शम्भुर्न चापरः ॥ ६९ ॥
तदनन्तर प्रथम अडूसेके फूलोंसे प्रातःकाल मृत्युञ्जयमहादेवको पूजकर और उनका ध्यान कर इस रसकी दो रत्ती प्रमाण मात्राको भक्षण करे। इसके सेवनसे ग्यारह प्रकारका क्षय, संग्रहणी, रक्तपित्त, अनेक प्रकारके वातज रोग, ४० प्रकारके पित्तज रोग और इनके अतिरिक्त अन्यान्य सर्वप्रकारके रोग नष्ट होते हैं। इससे सैंकड़ों स्त्रियोंको भोगनेकी शक्ति उत्पन्न होती है। इसपर ग्यारह दिनतक परहेज करके पश्चात् यथारुचि आहार और विहार करे तो मनुष्य कामदेवके समान सुन्दर, मेधावान्, बलवान्, विद्वान्, बहुभोजी और भीमके समान पराक्रमी होता है। पुत्रकी इच्छा करनेवाली स्त्री इसको सेवन करनेसे पुत्रको उत्पन्न करती है। इस रसके माहात्म्यको शिवजीके सिवा और कोई नहीं जानता ॥ ६६–६९ ॥
मकरध्वजरसायन ।
स्वर्णस्य भागौ वङ्गं च मौक्तिकं कान्तलौहकम् । जातीकोषफले रूप्यं कांस्यकं रससिन्दुरम् ॥ ७० ॥ प्रवालं कस्तुरी चन्द्रमभ्रकं चैकभागिकम् । स्वर्णसिन्दूरतो भागांश्चतुरः कल्पयेद्बुधः ॥ ७१ ॥
सुवर्णकी भस्म २ तोले एवं वङ्ग, मोती, कान्तलोह, जावित्री, जायफल, रूपा, काँसा, रससिन्दूर, मूँगा, कस्तूरी, कपूर और अभ्रक ये प्रत्येक औषधि एक एक तोला और स्वर्णसिन्दूर ४ तोले लेवे। इन सबको जलके द्वारा उत्तम प्रकारसे एकत्र खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे। फिर यथोचित अनुपानके साथ प्रतिदिन प्रातःकाल एक एक गोली सेवन करे ॥ ७० ॥ ७१ ॥
नातः परतरः श्रेष्ठः सर्वरोगनिषूदनः । सर्वलोकहितार्थाय शिवेन परिकीर्त्तितः ॥ ७२ ॥