भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । ११३

बृहत्सूचिकाभरणरस ।

रसगन्धकनागाभ्रं विषं स्थावरजङ्गमम् ।
मात्स्यमाहिषमायूरच्छागपित्तैर्विभावयेत् ॥ ४७ ॥
सूचिकाभरणो नाम भैरवेण प्रकीर्त्तितः ।
दातव्यः सूचिकाग्रेण पयःपेटीरसेन च ॥ ४८ ॥
त्रयोदशसन्निपाते विषूच्यामतिसारके ।
त्रिदोषजे तथा कासे दापयेत्कुशलो भिषक् ॥ ४९ ॥
पयःपेटीशतं दद्यात् भोजनं दधिभक्तकम् ।
तथा सुभर्जितं मांसं लेपनं तिलचन्दनैः ॥
रोगिणो यत्प्रियं द्रव्यं तस्मै तच्च प्रदापयेत् ॥ १५० ॥

पारा और गन्धककी कज्जली, सीसा, अभ्रक, स्थावरविष और जंगम ( कृष्ण सर्पका ) विष प्रत्येक समान भाग लेकर रोहू मछली, भैंसा, मोर और बकरेके पित्तमें क्रमसे एक एक दिनतक भावना देक सरसोंकी समान गोलियां बनाकर सुईकी नोकसे उठाकर इसको नारियलके जलके साथ सेवन करावे । इस रसको तेरह प्रकारके सन्निपातज्वर, विषूचिका, अतिसार और त्रिदोषजनित कासरोग आदिमें सेवन कराना चाहिये. इसपर १०० नारियलोंका जल, दहीभात और घृतमें भुना हुआ मांस तथा जो वस्तु रोगीको प्रिय लगे वह उसको सेवन करनेके लिये दे और रोगीके शरीरपर तिलके तेल और चन्दनादिका प्रलेप करना चाहिये ॥१४७-१५०॥

पानीयवटिका ।

रसमाषकचत्वारि इष्टकागुण्डके ग्रहः ।
शोषयित्वा ततः शोध्य तीक्ष्णपर्णे तथाऽऽर्द्रके ॥ ५१ ॥
स्वर्णधुस्तूरसत्त्वे च वृद्धदारद्रवे तथा ।
कन्यकानिजसत्त्वे च रसशोधनमुत्तमम् ॥ ५२ ॥
गन्धकं रसतुल्यं तु प्रक्षाल्य तण्डुलाम्बुना ।
कृत्वा तैलसमं दार्व्यां निर्वाप्य चित्रकद्रवे ॥ ५३ ॥
द्वाभ्यां कज्जलिकां कृत्वा लौहचूर्णस्य माषकम् ।
सुवर्णमाक्षिकं चापि तत्र लौहसमं ददेत् ॥ ५४ ॥