भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । १२१


श्रीधन्वन्तरिभगवान्ने प्रकाशित किया है । यह रस एक एक रत्ती परिमाण तुलसीके रसके साथ सेवन करावे । इसके सेवन करनेके पश्चात् सिरपर मूसलधार वर्षाके समान शीतल जलकी धारा छोड़े ! जब इस प्रकारसे भी शरीरकी ज्वाला शान्त न हो तब कभी कभी खाँडका शर्बत देवे और एकवार दही भातका भोजन करावे । जैसे शिवजीने कामदेवको और विष्णुने दानव समूहको नष्ट करदिया था और जैसे अग्निके द्वारा शीत तत्काल नष्ट हो जाता है उसी प्रकार यह रस सन्निपातज्वरको नष्ट करदेता है ॥ ९४-१०० ॥

पंचपित्तयुक्त रसका बलवत्त्व ।

ये रसाः पित्तसंयुक्ताः प्रोक्ताः सर्वत्र शम्भुना ।
जलसेकावगाहाद्यैर्बलिनस्ते तु नान्यथा ॥ १ ॥
रसजनितविदाहे शीततोयाभिषेको
मलयजघनसारालेपनं मन्दवातः ।
तरुणदधि सिताढ्यं नारिकेलीफलाम्भो
मधुरशिशिरपानं शीतमन्यच्च शस्तम् ॥ २ ॥

जो रसादि ओषधियाँ शिवजीने पित्तयुक्त कही हैं अर्थात् जिनमें पित्तकी भावना दी जाती है उन ओषधियोंको सेवन करानेके पश्चात् रोगीके शरीरपर तैलका मर्दन, जलसेचन आदि शीतोपचार करनेसे वे अधिक बलवती होकर विशेष गुण करती हैं । अन्यथा कुछ फलप्रद नहीं होती । रसादि ओषधियोंके सेवनसे शरीरमें दाह होनेपर देहपर शीतल जलका सेचन, चन्दन, कपूर आदिका लेपन, शीतल मन्द सुगन्ध वायुका सेवन, दही और मिश्री मिलाकर भातका भोजन, नारियलका जलपान करना मधुर और शीतल द्रव्योंका भक्षण और इसी प्रकार औरभी तरह तरहके शीतल उपचार करना चाहिये ॥ १ ॥ २ ॥

पञ्चवक्त्ररस ।

गन्धेशटङ्कमरिचं विषं धुस्तूरजैर्द्रवैः ।
दिनं विमर्दितं शुष्कं पञ्चवक्त्रो भवेद्रसः ॥
द्विगुञ्जमार्द्रनीरेण त्रिदोषज्वरहत्परः ॥ ३ ॥

पारे, गन्धककी कज्जली २ भाग, सुहागा, मिरच और शुद्ध वत्सनाभ ये प्रत्येक एक एक भाग लेकर सबको धतूरेके पत्तोंके रसमें एक दिनतक खरल करके सुखा-