भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । १४३

कफकेतुः कण्ठरोगं शिरोरोगं च नाशयेत् ।
पीनसं कफसंघातं सन्निपातं सुदारुणम् ॥ ३३१ ॥
शंखकी भस्म, सोंठ, मिरच, पीपल, सुहागा ये सब समान भाग और इन पाँचोंके बराबर शुद्ध वत्सनाभ विष लेकर सबको अदरखके रसमें तीनवार भावना देकर खरल करे, फिर एकएक रत्तीकी गोलियां बनालेवे। इनमेंसे एकएक गोली प्रातःसायंकाल अदरखके रसके साथ सेवन करावे। यह रस कण्ठसम्बन्धी रोग, शिरके रोग, पीनस, कफके समूह और दारुणसन्निपातको नष्ट करता है ॥ २९–३३१ ॥

श्लेष्मकालानलरस ।

हिंगूलसम्भवं सूतं गन्धकं मृतताम्रकम् ।
तुत्थं मनोह्वा तालं च कट्फलं धूर्त्तबीजकम् ॥ ३२ ॥
हिंगु समाक्षिकं कुष्ठं त्रिवृद्दन्ती कटुत्रिकम् ।
व्याधिघातफलं वङ्गं टङ्कणं समभागकम् ॥ ३३ ॥
स्नुहीक्षीरेण वटिकां कारयेत्कुशलो भिषक् ।
विज्ञाय कोष्ठं कालं च योजयेद्रक्तिकां क्रमात् ॥ ३४ ॥
वातश्लेष्मणि मन्देऽग्नौ पित्तश्लेष्माधिकेऽपि च ।
जीर्णज्वरे च श्वयथौ सन्निपाते कफोल्बणे ॥ ३५ ॥
बलासप्रबलं त्यक्त्वा धातुं वातात्मकं नयेत् ।
सेवनात्सर्वरोगघ्नः श्लेष्मकालानलो रसः ॥ ३६ ॥

सिङ्गरफसे निकालाहुआ पारा, गन्धक, ताम्रभस्म, तूतिया, मैनसिल, हरताल, कायफल, धतूरेके बीज, हींग, सोनामाखी, कूठ, निसोत दन्तीके बीज, सोंठ, मिरच पपिल, अमलतास, वङ्ग और सुहागा इन सब ओषधियोंको समान भाग लेकर थूहरके दूधमें खरल करके एकएक रत्तीकी गोलियां बनालेवे । सुयोग्यवैद्य रोगीके अग्न्याशयके बलाबल, देश, काल, पात्र आदिका भलीभांति विचार करके उसको क्रमसे एकएक गोली सेवन करावे । इस रसको अनुपानविशेषके साथ सेवन करनेसे वातश्लेष्म और पित्तश्लेष्मज्वर, मन्दाग्नि, जीर्णज्वर, सूजन और कफोल्बण सन्निपात ज्वरमें जब कि कफ क्षीण होकर वायु प्रबल होजाता है तब विशेष उपकार होता है । यह योग सम्पूर्ण रोगोंका नाश करनेवाला है ॥ ३२–३६ ॥