भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१४६ भैषज्यरत्नावली। [ रस-
ज्वरकेसरी।
शुद्धसूतं विषं व्योषं गन्धं त्रिफलमेव च ।
जयपालसमं कृत्वा भृङ्गतोयेन मर्दयेत् ॥ ३५० ॥
गुञ्जामात्रा वटी कार्या बालानां सर्षपाकृतिः ।
सितया च समं पीता पित्तज्वरविनाशिनी ॥ ५१ ॥
मरिचेन प्रयुक्ता सा सन्निपातज्वरापहा ।
पिप्पलीजीरकाभ्यां च दाहज्वरविनाशिनी ॥
ज्वरकेसरिनामाऽयं रसो ज्वरविनाशनः ॥ ५२ ॥
शुद्ध पारा, शुद्ध वत्सनाभ, सोंठ, मिरच, पीपल, गन्धक, हरड, बहेडा और आमला ये प्रत्येक ओषधि समानभाग और सबके बराबर जमालगोटे लेकर समस्त ओषधियोंका बारीक चूर्ण करलेवे, फिर भाँगरेके रसमें खरल करके एक एक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । किन्तु बालकोंके लिये सरसोंकी बराबर गोलियाँ बनावे । इन गोलियोंको मिश्रीके साथ सेवन करनेसे पित्तज्वर, मिरचोंके चूर्णके साथ देनेसे सन्निपातज्वर और पीपल तथा जीरेके चूर्णके साथ सेवन करनेसे दाहयुक्त ज्वरको नष्ट करती हैं । विशेषकर यह ज्वरकेसरीरस सबप्रकारके ज्वरोंको नष्ट करता है ॥ ३५०–५२ ॥
ज्वरभैरवरस।
त्रिकटु त्रिफला टङ्कं विषगन्धकपारदम् ।
जैपालं च समं मर्द्यं द्रोणपुष्पीरसैर्दिनम् ॥ ५३ ॥
ताम्बूलेन समं खादेव प्रातर्गुञ्जामितां वटीम् ।
मुद्गयूषं शिखरिणीं पथ्यं देयं प्रयत्नतः ॥ ५४ ॥
नवज्वरं त्रिदोषोत्थं जीर्णं च विषमज्वरम् ।
दिनैकेन निहन्त्याशु रसोऽयं ज्वरभैरवः ॥ ५५ ॥
सोंठ, मिरच, पीपल, हरड, बहेडा, आमला, शोधित वत्सनाभ, पारा, गन्धक और जमालगोटा सबको समानभाग लेकर एकत्र चूर्ण करले, फिर द्रोणपुष्पीके रसमें एक दिनतक खरल करके एकएक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । उनमेंसे प्रतिदिन प्रातःकाल एकएक गोली पानमें रखकर भक्षण करे । इसपर मूँगका यूष, शिखरिण आदि पदार्थोंका पथ्य देवे । यह रस नवीन ज्वर, त्रिदोष-जनित ज्वर, जीर्णज्वर, विषमज्वर आदि समस्त ज्वरोंको एक दिनमें ही नष्ट करदेता है ॥ ५३–५५ ॥