भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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१७२ भैषज्यरत्नावली । [ रस-

मिश्री या खाँडमें मिलाकर सेवन करे। और इसपर तेल, खटाई आदि पदार्थोंको त्याग करादे । यह रस विषमज्वर आदि सब प्रकारके ज्वरोंको दूर करता है ॥ ५०६-५०७ ॥

शीतारिरस ।

कूष्माण्डक्षारचूर्णोदकतिलजपृथक् पाचितं शुद्धतालं
तुल्यं सूतेन पिष्ट्वा त्रिदिवसमसकृत् कारवेल्लद्रवेण ।
क्षित्त्वा तत्खर्परान्तर्द्दिनपतिपिहितं रन्ध्रमप्यन्धयेत्तं
नीरन्ध्रं चूर्णपथ्यागुडलवणखटीमृद्भिरप्यन्तरालम् ॥ ८ ॥

तद्वालुकापूर्णघटे विदध्याच्छनैः पचेत्तावदुपर्य्यमुष्य ।
व्रीहिर्विवर्णत्वमुपैति यावत् ततस्तु शीतं विदधीत चूर्णम् ॥ ९॥

सिद्धं तच्च समाददीत तुलसीतोयेन वल्लोन्मितं
पश्चात् क्षौद्रकणासिताज्यपयसा कृत्वाऽनुपानं गदी ।
भुञ्जीताथ पयोऽन्नमुद्गरसहितं साज्यं च हन्यान्नृणां
तापं कालवशेन संचितगदं शीतारिनामा रसः ॥ ५१० ॥

पेठेका खार, चुनेका पानी और तिलोंका खार इन तीनों चीजोंके साथ पृथक् पृथक् हरतालको पकाकर शुद्ध करे । फिर हरतालके बराबर भाग पारेको उसमें मिलाकर करेलेके रसमें तीन दिनतक खरल करके एक सकोरेमें रक्खे । उस सकोरेके ऊपर ताँबेका कटोरा ढककर उसके सन्धिसथानोंको हरडके चूर्ण, गुड, नमक, खडिया-मिट्टी और चिकनी मिट्टी इन सब चीजोंके कल्कद्वारा बन्दकर देवे और उसके ऊपर कुछ धानोंके दाने रखदेवे । फिर उस सम्पुटको वालुकायन्त्रमें रखकर शनैः शनैः अग्नि देवे । जब धान खिलने लगे तब उत्तम प्रकारसे पाक हुआ जानकर स्वांगशीतल होनेपर ओषधिको निकालकर बारीक चूर्ण करलेवे । इस रसको दो दो रत्तीकी मात्रासे तुलसीपत्रके रस, मधु, पीपलका चूर्ण, मिश्री, घृत और दूध इन अनुपानोंके साथ सेवन करावे । इसपर दूध, भात, मूँगका यूष और घृत आदि पदार्थोंका भोजन हितकर है । यह शीतारिरस चिरकालसे संचित ज्वरको अत्यन्त शीघ्र नष्ट करता है ॥ ८-५१० ॥

ज्वरशूलहररस ।

रसगन्धकयोः कृत्वा कज्जलीं भाण्डमध्यगाम् ।
तत्राधोवदनां ताम्रपात्रीं संरुध्य शोषयेत् ॥ ११ ॥