भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१८० भैषज्यरत्नावली । [ रस-
हिचकी, श्वास, खाँसी, मन्दाग्नि, अरुचि आदि रोगोंको इस प्रकार शीघ्र नष्ट करता है जैसे-वज्र वृक्षोंको ॥ ५५-५८ ॥
जीवनानन्दाभ्र ।
वज्राभ्रं मारितं कृत्वा कर्षयुग्मं विचूर्णितम् ।
जीरं कनकबीजं च कर्षं वासारसेन च ॥ ५९ ॥
कण्टकारीरसेनैव धात्रीमुस्तरसेन च ।
गुडूच्याः स्वरसेनैव पलाशेन पृथक् पृथक् ॥ ६० ॥
मर्दयित्वा वटी कार्या गुञ्जामात्रा प्रयोजिता ।
विषमाख्याञ्जवरान्सर्वान्प्लीहानं यकृतं वमिम् ॥ ६१ ॥
रक्तपित्तं वातरक्तं ग्रहणीं श्वासकासकौ ।
अरुचिं शूलहृल्लासावर्शांसि च विनाशयेत् ॥ ६२ ॥
जीवनानन्दनामेदमभ्रं वृष्यं बलप्रदम् ।
रसायनमिदं श्रेष्ठमग्निसन्दीपनं परम् ॥ ६३ ॥
अभ्रककी भस्म २ कर्ष, जीरा और धतूरेके बीज एक एक कर्ष लेकर सबको एकत्र चूर्ण करके अडूसा, कटेरी, आमले, नागरमोथा और गिलोय इन प्रत्येकके चार चार तोले स्वरसमें क्रमसे अलग २ खरल करे । फिर एकएक रत्तीकी गोलियाँ बनाकर एकएक गोली यथादोषानुसार उचित अनुपानके साथ प्रयोग करे । यह रस सम्पूर्ण विषमज्वर, प्लीहा, यकृत, वमन, रक्तपित्त, वातरक्त, संग्रहणी, श्वास, खाँसी, अरुचि, शूल, हल्लास ( उबकाई ) और अर्शदोगको नष्ट करता है। यह जीवनानन्द नामक अभ्रक-अत्यन्त वृष्य, बलदायक, उत्तम रसायन और अग्निको अत्यन्त दीपन करनेवाला है ॥ ५९-६३ ॥
चन्दनादिलोह ।
रक्तचन्दनह्रीबेरपाठोशीर कणाशिवाः ।
नागरोत्पलधात्रीभिस्त्रिमदेन समन्वितम् ॥
लौहं निहन्ति विविधान् समस्तान्विषमज्वरान् ॥ ६४ ॥
लालचन्दन, सुगन्धवाला, पाठ, खस, पीपल, हरड, सोंठ, कमोदिनीकी जड, बबूल, आमले, नागरमोथा, चीता और वायविडङ्ग ये सब ओषधियाँ
^१ त्रिमदं चात्र—मुस्तकचित्रकविडङ्गम् । द्वादशद्रव्यसमं लोहं रक्तिद्वयं मधुना लिहेत् ॥