भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१८४ | भैषज्यरत्नावली । | [ रस-
वातिकं पैत्तिकं श्लैष्मं द्वन्द्वजं सान्निपातिकम् ।
जीर्णज्वरं च विषमं रोगसङ्करमेव च ॥
प्लीहानमग्रमांसं च यकृतं च विनाशयेत् ॥ ८७ ॥
चीतेकी जड, त्रिफला, त्रिकुटा, वायविडङ्ग, नागरमोथा, गजपीपल, पीपलामूल, खस, देवदारु, चिरायता, नेत्रवाला, कुटकी, कटेरी, सहिंजनेके बीज, मुलहठी और इन्द्रजौ ये सब ओषधियाँ समान भाग और सबकी बराबर लोहभस्म लेवे । सबको एकत्र जलके साथ खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । यह सर्वज्वरहर-लोह उपद्रवोंसहित समस्त ज्वरोंको नष्ट करता है । इससे वातज, पित्तज, कफज, द्वन्द्वज, सन्निपातज, जीर्णज्वर, विषमज्वर तथा अन्य भयंकर, रोग एवं तिल्ली, अग्र-मांस, यकृतविकार आदि समस्त रोग दूर होते हैं ॥ ८४-८७ ॥
बृहत्सर्वज्वरहरलोह ।
द्विपलं जारितं लौह रसं गन्धं द्वितोलकम् ।
तोलकं त्रिफला व्योषं विडङ्गं मुस्तकं तथा ॥
श्रेयसी पिप्पलीमूलं हरिद्रे द्वे च चित्रकम् ॥ ८८ ॥
आर्द्रकस्य रसेनैव वटिकां कारयेद्भिषक् ।
गुञ्जाद्वयां वटीं कृत्वा भक्षयेदार्द्रकद्रवैः ॥ ८९ ॥
लोहेकी भस्म ८ तोले, शुद्ध पारा २ तोले और शुद्ध गन्धक २ तोले, दोनोंकी कज्जली एवं त्रिफला, त्रिकुटा, वायविडङ्ग, नागरमोथा, गजपीपल, पीपलामूल, हल्दी दारुहल्दी और चीता ये प्रत्येक एकएक तोला सबको एकत्र कूट पीसकर अदरखके रसमें खरल करके दोदो रत्तीकी गोलियाँ तैयार करलेवे । फिर एकएक गोली अदरखके रसके साथ सेवन करे ॥ ८८-८९ ॥
सर्वज्वरहरं लोहं सर्वज्वरविनाशनम् ॥ ९० ॥
वातिकं पैत्तिकं चैव श्लैष्मिकं सान्निपातिकम् ।
विषमज्वरभूतोत्थज्वरं प्लीहानमेव च ॥ ९१ ॥
मासजं पक्षजं चैव तथा संवत्सरोत्थितम् ।
सर्वान्ज्वरान्निहन्त्याशु भास्करस्तिमिरं यथा ॥ ९२ ॥
यह लोह-वातिक, पैत्तिक, श्लैष्मिक, सान्निपातिक, विषमज्वर और भूत-बाधादिजनित सम्पूर्ण ज्वर, तिल्ली. महिनेमें आनेवाला, पक्षमें होनेवाला अथवा