भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| १९८ | भैषज्यरत्नावली । | [ तैल- |
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महानिम्बश्च हबुषा यवक्षारो महौषधम् ।
एषां कर्षद्वयं क्षिप्त्वा साधयेन्मृदुवह्निना ॥ ३५ ॥
चिरायतेको सौ पल प्रमाण लेकर एक द्रोण जलमें पकावे । चतुर्थांश शेष रहनेपर उतारकर छान लेवे । फिर उस क्वाथमें सरसोंका तेल चार सेर एवं मूर्वा और लाखका क्वाथ, कांजी और दहीका तोड ये प्रत्येक चार चार सेर तथा चिरायता, गजपीपल, रायसन, कूठ, लाख, इन्द्रायनकी जड, मंजीठ, हल्दी, दारुहल्दी, मूर्वा, मुलहठी, नागरमोथा, पुनर्नवा, सेंधानमक, बालछड, बडीकटेरी, चिरिया नमक, संचरनमक, सुगन्धवाला, सतावर, लालचन्दन, कुटकी, असगंध, सोया, रेणुका, देवदारु, खस, पद्माख, धनियाँ, पीपल, वच, कचूर, हरड, आमला, बहेडा, अजवायन, अजमोद, काकडासिंगी, गोखरू, शालपर्णी, पृश्निपर्णी, दन्तीकी जड, वायविडंग, जीरा, कालाजीरा, बकायनकी छाल, हाऊबेर, जवाखार और सोंठ इन सब ओषधियोंका कल्क दो दो कर्ष प्रमाण लेवे । सबको एकत्र मिलाकर विधिसे मन्द मन्द अग्निद्वारा पकावे ॥ २९–३५ ॥
यथाऽहिवर्गं विनिहन्ति तार्क्ष्यो यथा च भास्वांस्तिमिरस्य संघम् ।
तथैव सर्वं ज्वरवर्गमेतदभ्यङ्गमात्रेण निहन्ति तैलम् ॥ ३६ ॥
सन्ततं सततादींश्च सशोथान् विषमज्वरान् ।
प्लीहाश्रितान् सशोथान् वा प्रमेहं ज्वरमेव च ॥ ३७ ॥
अग्निं च कुरुते दीप्तं बलवर्णकरं परम् ।
पाण्ड्वादीन् हन्ति रोगांश्च किराताद्यमिदं बृहत् ॥ ३८ ॥
जिस प्रकार गरुड सर्पोंके समूहको और सूर्यका प्रकाश जैसे अन्धकारपुञ्जको नष्ट करदेताहै उसी प्रकार यह तेल मालिश करते ही सर्वप्रकारके ज्वरोंको नष्ट करता है, एवं सन्तत, सतत, शोथसहित विषमज्वर, प्लीहायुक्त ज्वर, प्रमेह, ज्वर, पाण्डुआदिरोगोंको यह बृहतकिरादितैल नष्ट करताहै तथा अग्निको दीपन करताहै और बल वर्णकी वृद्धि करता है ॥ ३६–३८ ॥
ज्वरभैरवतैल ।
गुडूची वासको निम्बो मूर्वामूलं सचन्दनम् ।
किरातो यवतिक्ता च सिन्दुवारदलानि च ॥ ३९ ॥