भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२०२ भैषज्यरत्नावली । [. तैल-
सोलहवाँ अंश लेवे और अन्यान्य द्रव्य मंजीठसे चौथाई भाग लेवे अर्थात् तैल सोलह सेर हो तो मंजीठ एक सेर लेवे और त्रिफलेसे लेकर नलिकातक प्रत्येक पदार्थ एकएक पाव लेवे । मूर्च्छापाकके द्वारा तैलकी दुर्गंध दूर होकर वह तैल उत्तमगन्ध और लालवर्णवाला होजाता है ॥ ५२ ॥ ५३ ॥
तैलादिके पकानेका समय ।
घृततैलगुडादींश्च नैकाहादवतारयेत् । व्युषितास्तु प्रकुर्वन्ति विशेषेण गुणान् यतः ॥ ५४ ॥
घी, तैल और गुडादिका पाक एकदिनमें ही समाप्त न करे । कारण ये द्रव्य बासी होकर ही विशेष गुण करते हैं ॥ ५४ ॥
पाकसिद्धिलक्षण ।
स्नेहकल्को यदाऽङ्गुल्या वर्तितो वर्त्तिवद्भवेत् । वह्नौ क्षिप्ते च नो शब्दस्तदा सिद्धिं विनिर्दिशेत् ॥ ५५ ॥ शब्दव्युपरमे प्राप्ते फेनस्योपरमे तथा । गन्धवर्णरसादीनां सम्पत्तौ सिद्धिमादिशेत् ॥ ५६ ॥
घी और तैलादिके पकानेका कल्क जब अंगुलियोंसे मलनेपर उसकी बत्तीसी होजाय और घृत वा तैलको अग्निमें डालनेसे उसमें चरचरशब्द न हो तब स्नेहादिका पाकहुआ जानना चाहिये । और स्नेहपाकके समय जो तैल घृतादिमें इक प्रकारका शब्द और फेनोद्गम ( झागोंका आना ) होता है, उसके शान्त होनेपर एवं स्नेहमें डालेहुए पदार्थोंके गन्ध, वर्ण और रस स्नेहपदार्थमें उत्तमप्रकारसे मिलजानेपर घृत तैलादिक सिद्ध हुआ जानना चाहिये ॥ ५५ ॥ ५६ ॥
जीर्णज्वरमें पेयादि देनेकी अवधि ।
ज्वरे पेयाः कषायाश्च सर्पिः क्षीरं विरेचनम् । षडहे षडहे देयं कालं वीक्ष्यामयस्य च ॥ ५७ ॥
ज्वरमें काल ( ऋतु ) और रोगकी अवस्थाका विचारकर ज्वरके आरंभक दिनसे लेकर छः दिनके बाद रोगीको पेया, कषाय ( क्वाथ ), घी, दूध और मृदुविरेचनकी औषधि देवे ॥ ५७ ॥
ज्वरमें संशोधन ।
ज्वरिभ्यो बहुदोषेभ्य ऊर्ध्वं चाधश्च बुद्धिमान् । दद्यात्संशोधनं काले कल्पे यदुपदेक्ष्यते ॥ ५८ ॥