भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| २२६ | भैषज्यरत्नावली । | [ज्वरातिसार- |
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पारेकी भस्म १ तोला, शुद्ध गन्धक २. तोले और अभ्रकभस्म ४ तोले लेवे। इन सबको सरसोंके तेलमें एकदिनतक खरल करके शरावसंपुटमें रख वालुकायंत्रमें एक प्रहरतक पकावे । जब पककरस्वांगशीतल होजाय तब निकाल कर भाँगरेकी जड़के रसमें एक प्रहरतक खरल कर और पूर्वोक्तविधिसे संपुटमें रखकर पकावे । पीछे स्वांगशीतल होनेपर निकालकर उसका चूर्ण कर लेवे । फिर उसमें जवाखार, सज्जी, सुहागा, कालानमक, सैंधानमक, विड़ियासंचरनमक, कचियानमक, साँभर-नमक, शुद्ध मीठातेलिया, सोंठ, मिरच, पीपल, चीता, जीरा और वायविडङ्ग इन औषधियोंके समानभाग मिश्रित चूर्णको मिलाकर खरल करे तो वह कारुण्यसागर रस सिद्ध होता है ॥ ८० ॥ ८१ ॥
माषमात्रं ददीतास्य भिषक् सर्वातिसारके ।
सज्वरे विज्वरे वापि सशूले शोणितोद्भवे ॥ ८२ ॥
निरामे शोथयुक्ते वा ग्रहण्यां सान्निपातिके ।
अनुपानं विनाप्येष कार्यसिद्धिं करिष्यति ॥ ८३ ॥
सर्वप्रकारके अतीसार, ज्वरसहित व ज्वररहित एवं शूलयुक्त रक्तातिसार, आमरहित सूजनवाली ग्रहणी और सन्निपात आदि रोगोंमें एक एक माशे परिमाण सेवन करना चाहिये, यह रस अनुपानके बिना भी आरोग्य प्रदान करता है ॥८२॥८३॥
मृतसञ्जीवनरस ।
रसगन्धौ समौ ग्राह्यौ सूतपादं विषं क्षिपेत् ।
सर्वतुल्यं मृतं ताम्रं मर्द्यं धुस्तूरजद्रवैः ॥ ८४ ॥
सर्पाक्ष्याश्च द्रवैर्यामं कषायेणाथ भावयेत् ।
धातक्यतिविषामुस्तं शुण्ठीजीरकबालकम् ॥ ८५ ॥
यमानीधान्यकं बिल्वं पाठा पथ्या कणान्वितम् ।
कुटजस्य त्वचं बीजं कपित्थं बालदाडिमम् ॥ ८६ ॥
प्रत्येकं कर्षमात्रं स्यात्कुट्टितं क्वाथयेज्जलेः ।
चतुर्गुणं जलं दत्त्वा यावत्पादावशेषितम् ॥ ८७ ॥
अनेन त्रिदिनं भाव्यं पूर्वोक्तं मर्दितं रसम् ।
रुद्ध्वा तद्वालुकायन्त्रे क्षणं मृद्वग्निना पचेत् ॥ ८८ ॥
मृतसञ्जीवनो नाम-