भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

पृष्ठ 282, कुल 1416 में से

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२६० भैषज्यरत्नावली । [ अतिसार-

वातज और शूलयुक्त प्रवाहिकारोगमें कच्चे बेलका सूखा गूदा, गुड, तिलका तैल, पीपल और सोंठ इन सबको एकत्र मिलाकर सेवन करना हितकारी है ॥ १०८ ॥

पयसा पिप्पलीकल्कः पीतो वा मरिचोद्भवः । त्र्यहात् प्रवाहिकां हन्ति चिरकालानुबन्धिनीम् ॥ ९ ॥

पीपलके कल्क या काली मिरचाक कल्कको दूधके साथ सेवन करनेसे बहुत दिनोंकी पुरानी प्रवाहिका तीन दिनमें शमन होती है ॥ १०९ ॥

कल्कः स्याद्बालबिल्वानां तिलकल्कश्च तत्समः । दध्नः साराम्लस्नेहाढ्यः सद्यो हन्यात् प्रवाहिकाम् ॥ ११० ॥

कच्चे बेलकी गिरीका कल्क और उसके समान तिलोंका कल्क लेकर दहीकी मलाई, खट्टा और स्नेहयुक्त करके पान करनेसे प्रवाहिकारोग शीघ्र नष्ट होता है १०

बिल्वौषणं गुडं लोध्रं तैलं लिह्यात् प्रवाहणे ॥ ११ ॥

प्रवाहिका रोगीके लिये बेलगिरी कालीमिरच, गुड, लोध और तिलका तेल इन सबको समान भाग लेकर और मिलाकर सेवन करना चाहिये ॥ ११ ॥

दध्ना ससारेण समाक्षिकेन भुञ्जीत निस्सारकपीडितस्तु । सुतप्तरूप्यक्वथितेन वापि क्षीरेण शीतेन मधुप्लुतेन ॥ १२ ॥

मलाईसहित दहीके साथ शहद मिलाकर भक्षण करनेसे अथवा तपाई हुई चाँदीको बुझाकर उस दूधको शीतल करके और उसमें शहद मिलाकर पान करनेसे प्रवाहिकारोग दूर होता है ॥ १२ ॥

तासामतीसारवदादिशेच्च लिङ्गं क्रमं चामविपक्वतां च ॥ १३ ॥

प्रवाहिका रोगके लक्षण, चिकित्सा एवं आम और पक्वलक्षण अतीसारकी समान जानने चाहिये ॥ १३ ॥

अहिफेनयोग ।

अहिफेनं सुसंभृष्टं खर्परे मृदुवह्निना । हिक्कातीसारशमनं भेषजं नास्त्यतः परम् ॥ १४ ॥

अफीमको मिट्टीके पात्रमें मन्दअग्निसे अच्छे प्रकार भूनकर उचित मात्रासे प्रयोग करनेसे हिचकी और अतिसाररोग शमन होता है ॥ १४ ॥

अहिफेनवटिका ।

अहिफेनं सखर्जूरं घृष्ट्वा गुञ्जैकमात्रकम् । रक्तस्रावमतीसारमतिवृद्धं विनाशयेत् ॥ १५ ॥

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