भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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२६० भैषज्यरत्नावली । [ ग्रहणी-

ग्रहणीरोगकी चिकित्सा ।

ग्रहणीमाश्रितं दोषमजीर्णवदुपाचरेत् । अतिसारोक्तविधिना तस्यामं च विपाचयेत् ॥ १ ॥ संग्रहणीरोगमें अजीर्णरोगकी समान चिकित्सा करनी चाहिये और अतिसाररोगमें कही हुई विधिके द्वारा अपक्व दोषोंको पकाना चाहिये ॥ १ ॥

शरीरानुगते सामे रसे लंघनपाचनम् । विशुद्धामाशयायास्मै पंचकोलादिभिर्युतम् ॥ दद्यात्पेयादि लध्वन्नं पुनर्योगॉश्च दीपकान् ॥ २ ॥ शरीरमें अपक्वरसके संचित होनेपर रोगीको लंघन कराके दोषोंको पचावे । फिर वमन और विरेचनादिके द्वारा आमाशयको शुद्धकरके पंचकोलआदिसे सिद्ध किये हुए पेयादि हल्के अन्न भोजनके लिये और अग्निप्रदीपक औषधियें सेवन करावे ॥२॥

ग्रहणीदोषिणां तक्रं दीपनं ग्राहि लाघवात् । पथ्यं मधुरपाकित्वान्न च पित्तप्रकोपनम् ॥ ३ ॥ कषायोष्णविकाशित्वाद्रौक्ष्याच्चैव कफे हितम् । वाते स्वाद्वम्लसान्द्रत्वातसद्यस्वमविदाहि तत् ॥ ४ ॥ संग्रहणीरोगवाले मनुष्योंको तक्र ( मट्ठा ) लघुपाकी ( हल्का ) होनेसे अग्निप्रदीपक, मलरोधक और पथ्य है । एवं मधुरपाकी होनेसे पित्तको कुपित नहीं करता तथा कषैला, उष्ण, विकाशी और रूक्ष होनेसे कफजन्यरोगोंमें हितकारी है और मधुर, अम्ल तथा सान्द्र ( गाढा ) होनेसे वातरोगोंमें उपयोगी है । तत्कालका प्रस्तुतकिया हुआ मट्ठा विशेष गुणकारी और दाहनाशक है ॥ ३ ॥ ४ ॥

शुंठीं समुस्ताविषां गुडूचीं पिबेज्जलेन क्वथितां समांशाम् । मन्दानलत्वे सततामतापामामानुबन्धे ग्रहणीगदे च ॥ ५ ॥ मन्दाग्नि, आमातिसार, आमाविबन्ध और आमयुक्तग्रहणीमें सोंठ, नागरमोथा, अतीस और गिलोय इनको समानभाग लेकर यथाविधि क्वाथ बनाकर पान करना चाहिये ॥ ५ ॥

धान्यकातिविषोदीच्ययमानीमुस्तनागरम् बलाद्विपर्णीबिल्वं च दद्याद्दीपनपाचनम् ॥ ६ ॥