भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

पृष्ठ 299, कुल 1416 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 299

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । २६७

महालवङ्गाद्यचूर्ण ।

लवङ्गं जीरकं कौन्ती सैन्धवं त्रिसुगन्धिकम् ।
अजमोदा यमानी च मुस्तकं सकटुत्रयम् ॥ ४६ ॥
त्रिफला शतपुष्पा च पाठा भूनिम्बगोक्षुरम् ।
जातीकोषफले दार्वी नलदं चन्दनं मुरा ॥ ४७ ॥
शठी मधुरिका मेथी टङ्कणं कृष्णजीरकम् ।
क्षारद्वयं बालकं च बिल्वं पौष्करकं तथा ॥ ४८ ॥
चित्रकं पिप्पलीमूलं विडङ्गं सधनीयकम् ।
रसाभ्रगन्धकं लोहं समं सर्वं विचूर्णितम् ॥ ४९ ॥

लौंग, जीरा, रेणुका, सेंधानमक, दालचीनी, तेजपात, इलायची, अजमोद, अजवायन, नागरमोथा, सोंठ, पीपल, मिरच, हरड, आमला, बहेडा, सोया, पाठ, चिरायता, गोखुरू, जावित्री, जायफल, दारुहल्दी, खस, रक्तचन्दन, मुरामांसी, कचूर, सोंफ, मेथी, सुहागा, कालजीरा जवाखार, सज्जी, सुगन्धवाला, बेलगिरी, पुहकरमूल, चीतेकी जड, पीपलामूल, वायविडङ्ग, धनियाँ, शुद्धपारा, अभ्रक, शुद्ध गन्धक और लोहेकी भस्म इन सबको समान भाग लेकर बारीक चूर्ण करलेवे ॥ ४६–४९ ॥

उष्णोदकानुपानेन मन्दाग्नेर्दीपनं परम् ।
शीततोयानुपानैर्वा बुद्ध्वा दोषगतिं भिषक् ॥ ५० ॥
आमातिसारं ग्रहणीं चिरकालोत्थितामपि ।
शूलं विष्टम्भमानाहं विषूचीं शोथकामले ॥ ५१ ॥
हलीमकं पाण्डुरोगं हन्ति कास विशेषतः ।
लवङ्गाद्यं महच्चूर्णं शर्करासहितं पिबेत् ॥ ५२ ॥
आध्मानं शमयेच्छीघ्रं लवङ्गस्यानुपानतः ।
अश्विभ्यां निर्मितं ह्येतल्लोकानुग्रहकाङ्क्षया ॥ ५३ ॥

इस चूर्णको गरम जलके साथ पान करनेसे अग्नि अत्यन्त दीपन होती है और दोषोंके बलाबलको विचारकर शीतलजलके साथ पान करनेसे आमयुक्त अतिसार, पुरानी संग्रहणी, शूल, विबन्ध, आनाह, विषूचिका, सूजन, कामला, हलीमक, पाण्डुरोग और विशेषकर खाँसी ये सब रोग शीघ्र नष्ट होते हैं । यह महालवंगाद्यचूर्ण मिश्रीके साथ सेवन करनेसे और इसपर लौंगके जलका अनुपान करनेसे अफारेको

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित) · पृष्ठ 299, कुल 1416 में से · BharatKosha