भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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२७८ | भैषज्यरत्नावली | [ ग्रहणी-

र्कोंको एक वर्षपर्यन्त नियमपूर्वक सेवन करनेसे मनुष्य सर्वगुणसम्पन्न स्थिरबुद्धि होता है। बिना अवस्थाके ही बालोंका पकना और मृत्यूतक नष्ट होजाती है। इन श्रीकामेश्वर मोदकोंको सम्पूर्ण प्राणियोंके हितके लिये नित्यनाथने वर्णन किया है। यें कामेश्वरमोदक वृद्धमनुष्योंको प्रौढावस्थावाली स्त्रियोंके साथ संगम करनेपर वृद्धमनुष्योंके भी चित्तमें उत्पन्न कामशक्तिकी वृद्धि करते हैं। सिंहके समान पराक्रमी और अनुभवसिद्ध योग है। अतएव यह प्रयोग राजाओंको सदा सेवन करना चाहिये ॥ ११-१५ ॥

मदनमोदक ।

त्रैलोक्यविजयापत्रं सबीजं घृतभर्जितम् ।
समे शिलातले पश्चाच्चूर्णयेदतिचिक्कणम् ॥ १६ ॥
त्रिकटु त्रिफला शृङ्गी कुष्ठधान्यकसैन्धवम् ।
शठी तालीशपत्रं च कट्फलं नागकेशरम् ॥ १७ ॥
अजमोदा यमानी च यष्टीमधुकमेव च ।
मेथी जीरकयुग्मं च गृहीत्वा श्लक्ष्णचूर्णितम् ॥ १८ ॥
यावन्त्येतानि चूर्णानि तावदेव तदौषधम् ।
तावदेव सिता देया यावदायाति बन्धनम् ॥ १९ ॥
घृतेन मधुना मिश्रं मोदकं परिकल्पयेत् ।
त्रिसुगन्धिसमायुक्तं कर्पूरेणाधिवासयेत् ।
स्थापयेद् घृतभाण्डे च श्रीमन्मदनमोदकम् ॥ १२० ॥

घीमें भुनीहुई बीजोंसहित भांगको २० तोले लेकर उत्तम पत्थरपर खूब बारीक पीसलेवे। फिर बहेडा, काकडासिंगी, कूठ, धनियाँ, सैन्धानमक, कचूर, तालीसपत्र, कायफल, नागकेशर, अजमोद, अजवायन, मुलहठी, मेथी, जीरा और कालाजीरा प्रत्येकका बारीक पिसा हुआ चूर्ण एकएक तोला और संपूर्ण चूर्णके बराबर मिश्री मैलालेवे। पश्चात् घृत और शहद इनको मिलाकर त्रिजातकके चूर्ण मिलाकर मोदक बनावे और उनको कपूरसे सुवासित कर घीके चिकने बासनमें भरकर रखदेवे। इसको मदनमोदक कहते हैं ॥ १६-१२० ॥

भक्षयेत् प्रातरुत्थाय वातश्लेष्मविनाशनम् ।
कासघ्नं सर्वशूलघ्नमामवातविनाशनम् ॥ २१ ॥