भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

पृष्ठ 313, कुल 1416 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 313

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । २८१


महाग्निजननं वृष्यमामवातनिषूदनम् ।
ग्रहण्यर्शोविकारघ्नं प्लीहपाण्डुगदापहम् ॥ ३७ ॥
प्रमेहान् विंशतिं हन्ति कासं श्वासं च दारुणम् ।
छर्द्यतीसारशमनं सर्वरूढिविनाशनम् ॥
मेथीमोदकनामेदं पतञ्जलिमुनेर्मतम् ॥ ३८ ॥

इन मोदकोंको नित्य प्रातःकाल यथादोषानुसार उचित अनुपानके साथ सेवन करनेसे सब प्रकारकी मन्दाग्नि, विशेषकर आमदोष, संग्रहणी, अर्श, प्लीहा, पाण्डु, बीसों प्रमेह, कठिन खाँसी, श्वास, वमन, अतिसार और सर्व प्रकारके पुराने जटिल रोग नष्ट होते हैं । ये मोदक अग्निको अत्यन्त दीपन करनेवाले और वृष्य तथा आमवातनाशक हैं । इस बृहन्मेथीमोदकनामक योगको पतञ्जलिमुनिने निर्माण किया है ॥ ३६-३८ ॥

मुस्तकादिमादक ।

धान्यकं त्रिफला भृङ्गं त्रुटिः पत्रं लवङ्गकम् ।
केशरं शैलजं शुण्ठी पिप्पली मरिचानि च ॥ ३९ ॥
जीरकं कृष्णजीरं च यमानी कट्फलं जलम् ।
धातकीपुष्पकं व्याधिर्जातीकोषफले तथा ॥ १४० ॥
मधूरिका चाजमोदा हबुषं नागपर्ण्यपि ।
उग्रगन्धा शठी मांसी कुटजस्य फलं शुभम् ॥ ४१ ॥
एतानि श्लक्ष्णचूर्णानि कारयेत् कुशलो भिषक् ।
सर्वचूर्णसमं देयं जलदस्यापि चूर्णकम् ॥
सिता च द्विगुणा देया मोदकं परिकल्पयेत् ॥ ४२ ॥

धनियाँ, हरड. आमला, बहेडा, दालचीनी, छोटीइलायची, तेजपात, लौंग, नागकेशर, भूरिछरीला, सोंठ, पीपल, मिरच,जीरा, कालाजीरा, अजवायन, कायफल, सुगन्धवाला, धायके फूल, कूट, जावित्री, जायफल, सौंफ, अजमोद, हाऊबेर, पान, वच, कचूर; बालछड, इन्द्रजौ और वंशलोचन इन सबको समान भाग लेकर बारीक चूर्ण करलेवे । फिर सब चूर्णकी बराबर नागरमोथेका चूर्ण और नागरमोथेके चूर्ण सहित समस्त चूर्णसे दुगुनी मिश्री लेवे । सबको यथाविधिसे एकत्र मिलाकर मोदक बनालेवे ॥ ३९-१४२ ॥