भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

पृष्ठ 337, कुल 1416 में से

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चिकित्सा ] भावार्थदीपिकासहितः ।


अश्मरीं मूत्रकृच्छ्रं च मूत्राघातं सुदारुणम् ।
ज्वरं जीर्णं तथा पाण्डुं तन्द्रालस्यभ्रमं क्लमम् ॥ ३०७ ॥
दाहं च विद्रधिं हिक्कां जडगद्गदमूकताम् ।
मूढं च स्वरभेदं च वृध्नवृद्धिंविसर्पकान् ॥ ३०८ ॥
ऊरुस्तम्भं रक्तपित्तं गुदभ्रंशारुची तृषाम् ।
कर्णनासामुखोत्थांश्च दन्तरोगंश्च पीनसान् ॥ ३०९ ॥
शोथं च शीतपित्तं च स्थावरादिविषाणि च ।
वातपित्तकफोत्थांश्च द्वन्द्वजान् सन्निपातिकान् ॥ ३१० ॥
सर्वानेव गदान् हन्ति चण्डांशुरिव पापहा ।
बलवर्णकरो हृद्य आयुष्यो वीर्यवर्द्धनः ॥ ३११ ॥
परं वाजीकरः श्रेष्ठः पटुदो मन्त्रसिद्धिदः ।
अरोगी दीर्घजीवी स्याद्रोगी रोगाद्विमुच्यते ।
रसस्यास्य प्रसादेन बुद्धिमान् जायते नरः ॥ ३१२ ॥

यह रस-मन्दाग्नि, आमदोष, विषूचिका, प्लीहा, गुल्म, उदररोग, अष्ठीला, यकृत, पाण्डु, कामला, हृदयशूल, पृष्ठशूल, पार्श्वशूल, कटिशूल, कुक्षिशूल, आनाह, आठ प्रकारके शूल, श्लीपद, खाँसी, श्वास, वात, आमवात, अर्बुद, गलगण्ड, गण्डमाला, अम्लपित्त, गर्दभी, कृमि, कुष्ठ, दद्रु, वातरक्त, भगन्दर, उपदंश, संग्रहणी, अतिसार, बवासीर, प्रमेह, पथरी, मूत्रकृच्छ्र, दारुण मूत्राघात, जीर्णज्वर, पांडु, तन्द्रा, आलस्य भ्रम, ग्लानि, दाह, विद्रधि, हिक्कारोग, जडता, मूकता, गद्गदता, मूढता, स्वरभेद, वृध्न ( बद ), अंडवृद्धि, विसर्प, ऊरुस्तम्भ, रक्तपित्त, गुदभ्रंश, अरुचि, तृषा, कान नाक मुख और दाँतोंके रोग, पीनस, शोथ, शीतपित्त, स्थावर आदि विष, वात पित्त और कफसे उत्पन्न हुए, द्वन्द्वज, सान्निपातिक सम्पूर्णरोगोंको शीघ्रही नष्ट करता है। बल वर्णको उत्पन्न करनेवाला, हृदयको हितकारी, आयु और वीर्यके बढाने-वाला है तथा अत्यन्त वाजीकरण है। चातुर्य और मन्त्रकी सिद्धिको देनेवाला है। इस रसके प्रतापसे रोगी सब रोगोंसे मुक्त होजाता है और अरोगी दीर्घजीवी और अत्यन्त बुद्धिमान् होता है ॥ ३०३-३१२ ॥

बृहन्नृपवल्लभ ।

रसगन्धकलौहाभ्रं नागं चित्रं त्रिवृत्समम् ।
टङ्कं जातीफलं हिङ्गु त्वगेलाब्दलवङ्गकम् ॥ १३ ॥
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