भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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पृष्ठ 358

३२६ भैषज्यरत्नावली । [ ग्रहणी-


विचारकर उचित मात्रासे सेवन करे तो मन्दाग्नि आदि सर्वविकार दूर होते हैं ॥ १ ॥

बिल्वादिघृत ।

बिल्वाग्निचव्यार्द्रकशृङ्गवेरक्वाथेन कल्केन च सिद्धमाज्यम् ।
सच्छागदुग्धं ग्रहणीगदोत्थशोथाग्निमान्द्यारुचिनुद्वरिष्ठम् ॥ २ ॥

बेलगिरी, चीतेकी जड, चव्य, अदरख और सोंठ इन प्रत्येकके क्वाथ और कल्क, एवं बकरीके दूधके साथ विधिपूर्वक घृतको सिद्ध करे । यह घृत संग्रहणी और तज्जन्य उपद्रव तथा सूजन, मन्दाग्नि, अरुचिप्रभृति विकारोंको नष्ट करनेके लिये सर्वोत्तम है ॥ २ ॥

बिल्वगर्भघृत ।

मसूरस्य कषायेण बिल्वगर्भे पचेद् घृतम् ।
हन्ति कुक्ष्यामयान् सर्वान् ग्रहणीपाण्डुकामलाः ॥ ३ ॥

मसूरका क्वाथ और बेलगिरीके कल्कके द्वारा यथाविधि घृतको सिद्ध करे । यह घृत सर्वप्रकारके कुक्षिगत रोग एवं ग्रहणी, पाण्डु, कमला आदि विकारोंको शमन करता है ॥ ३ ॥

शुण्ठीघृत ।

विश्वौषधस्य गर्भेण दशमूलजले शृतम् ।
घृतं निहन्याच्छ्वयथुं ग्रहणीं सामतामयम् ॥ ४ ॥

सोंठके कल्क और दशमूलके काढेमें सिद्ध कियाहुआ घृत आमयुक्त ग्रहणी और सूजनको नष्ट करता है ॥ ४ ॥

नागरघृत ।

घृतं नागरकल्केन सिद्धं वातानुलोमनम् ।
ग्रहणीपाण्डुरोगघ्नं प्लीहकासज्वरापहम् ॥ ५ ॥

केवल सोंठके कल्कके द्वारा सिद्ध किया हुआ घृत ग्रहणी, पाण्डुरोग, तिल्ली, खाँसी और ज्वरको दूर करता है और वायुका अनुलोमन करता है ॥ ५ ॥

चित्रकघृत ।

चित्रकक्वाथकल्काभ्यां ग्रहणीघ्नं शृतं हविः ।
गुल्मशोथोदरप्लीहशूलार्शोघ्नं प्रदीपनम् ॥ ६ ॥

चीतेके क्वाथ और कल्कके द्वारा यथाविधि प्रस्तुत किया हुआ घी ग्रहणी, शोथ, उदररोग, गुल्म, प्लीहा, शूल, अर्शादिरोगोंको नाशकरनेवाला और विशेषकर अग्निप्रदीपक है ॥ ६ ॥